कहानी धूप और छांव: दो बहनों की ये कहानी बयां करती है जीवन का सत्य

कहानी धूप और छांव: दो बहनों की ये कहानी बयां करती है जीवन का सत्य
  • यह छोटी-सी कहानी मानव-मन के अनेक रहस्यों को हमारे सामने खोलती है।
  • दो बहनें, एक-दूसरे से सर्वथा विपरीत, सहसा स्वयं को एक जैसे दु:ख में पाती हैं तो अधिक सदाशय और संवेदनशील हो जाती हैं। किंतु जो मन दु:ख की शर्त पर मिलते हैं, क्या वो किसी दूसरी परिस्थिति में फिर से विलग नहीं हो सकते?
  • इस कहानी में जिस जीवन-सत्य का चित्र उभरकर आया है, उससे पाठक निश्चय ही एक समानुभूति का अनुभव करेंगे।

वह टहलती हुई पेड़-पौधों की सुरंगनुमा गलियों से होकर गुज़री, तो उसे एहसास हुआ, जो हो चुका है उसे रोका नहीं जा सकता था। बाग़ीचों की काली गीली दलदली मिट्टी के रास्तों से होते हुए वो तालाब किनारे जा पहुंची। सूरज की एक किरण मकड़ी के जालों भरी शहतीर से तिरछी आ रही थी, जो सीधे पहले सीढ़ियों पर बैठी युवती पर पड़ रही थी। उसने आने की आहट सुनी तो पीछे पलटकर बोली, इधर आ जाओ। वह युवती मौन संवाद के बीच वहां आकर बैठ गई। दोनों की नज़रें मिलीं और दर्द की टीस दोनों के दिमाग़ में घूम गई।

यह दोनों कुछ समय पहले तक एक-दूसरे के विपरीत थीं। एक बिल्कुल अलमस्त नाज़ुक-सी तो दूसरी एकदम होशियार और ज़िम्मेदार। एक हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाती तो दूसरी छोटे से छोटे काम को भी अंजाम न दे पाती। दोनों एक-दूसरे को सख़्त नापसंद करती थीं। बेशक...! वो सगी बहनें थीं। क़िस्मत ने उनकी शादी भी एक ही घर में दो भाइयों से करवा दी। जिस कारण जो बड़ी बहन शैली थी, वो देवरानी बन गई और जो छोटी बहन कैरी थी, वो जेठानी। जेठानी बनी छोटी बहन हर समय अपनी बड़ी बहन को जताने की कोशिश करती कि तुम भले हर काम में मुझसे बेहतर हो, पर मैं तुमसे ओहदे में अब बड़ी हूं। बचपन की ये तक़रार शादी होने पर दुश्मनी में बदल गई।

लेकिन विधाता ने दोनों की क़िस्मत शायद एक ही क़लम की स्याही से लिखी थी। बड़े भाई यानी कैरी के पति अमेरिका में डॉक्टर थे और छोटे भाई यानी शैली के पति शिप पर काम करते, जिसके कारण वो अक्सर कई-कई महीने बाहर रहते थे। इसी दौरान कोरोना नामक महामारी ने पैर पसार लिए। एक दिन अचानक लॉकडाउन की घोषणा हो जाती है। उस समय दूसरी वाली बहन अमेरिका से भारत आई हुई थी। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में वो अपने पतियों के सम्पर्क में थीं, फिर अचानक दोनों का अपने पतियों से सम्पर्क नहीं हो पाता है। एक दिन अमेरिका से फ़ोन आता है कि कैरी के पति ड्यूटी के दौरान इलाज करते हुए कोरोना से संक्रमित हो गुज़र गए। कैरी को जब यह सूचना मिली, तो हमेशा अलमस्त रहने वाली लड़की उसके बाद से एकदम चुप लगा गई। वो हर समय रोती रहती, उसके गालों की त्वचा के नीचे की मांसपेशियां गीली और कांपती रहतीं।

उसकी बड़ी बहन शैली चाहती कि वह हालात से समझौता करें, यूं हर वक़्त रोते रहने के बजाय परिस्थितियों का डटकर मुक़ाबला करे। कोई चीज़ थी जो उसे अंदर ही अंदर टुकड़े-टुकड़े कर रही थी। इसी बीच दूसरी बहन के पति के बारे में भी सूचना आती है कि उनके शिप को समुद्री डाकुओं ने लूट लिया और ख़ूनख़राबे के चलते सभी चौदह कर्मचारियों की मौत हो गई।

तालाब की सीढ़ियों पर बैठी दो जवान सुंदर युवतियां, जो हमेशा एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी रहीं, आज अपने-अपने दु:ख में एक-दूसरे को हिम्मत बंधा रही थीं। दोनों के पतियों की मौत की ख़बर एक के एक बाद आई। इस हादसे की ख़बर चारों तरफ़ शहर में फैल गई। बहुत सारे जानने वाले रिश्तेदार मिनट-मिनट पर फ़ोन करते और कहते क्या करें हम तो मातमपुर्सी करने आना चाहते हैं, लेकिन हम लाचार हैं। इस कोरोना-काल में हम आ नहीं सकते, नहीं तो दौड़कर चले आते। अब उन्हें कौन समझाता। मरने वाले यहां नहीं सात समुंदर पार मरे हैं और दोनों बहनें स्वस्थ हैं।

लेकिन कोरोना के भय के चलते लोग आपस की संवेदनाओं को भूल गए थे। सारे नाते-रिश्तेदार फ़ोन पर ही सारी हमदर्दी जता देना चाहते थे। दोनों बहनें अपने इस भारी दुःख के पल में पतियों को याद करते हुए अकेला रहना चाहती थीं। जो अब तक एक-दूसरे की दुश्मन बनी बैठी थीं, पतियों की मौत के बाद से एक-दूसरे को जड़ों से महसूस करने लगी थीं। उन्होंने एक-दूसरे के मन को समझा और घंटों रो लेने के बाद जो शांत और जि़म्मेदार बहन थी बोली, चलो अब घर चलते हैं, तुमने कल रात से कुछ नहीं खाया है। दूसरी ने कहा, नहीं, मुझे घर नहीं जाना, वहां फ़ोन की घंटी चैन से रोने भी नहीं देती है।

इस तालाबंदी में सब सुनसान था। कभी इंसानी वजूद से भरा ये पार्क आज सिर्फ़ पक्षियों के कोलाहल से भरा था, शेष सन्नाटा था। वो गहराते अंधेरे में सरकती चली गईं। घर वापस आते ही अपने दु:खों से घिर गईं। कमरे में मौजूद हर सामान उन्हें अपने पतियों की याद दिलाते। टीवी के सामने पड़ी वो आरामकुर्सियां, जिन पर वो कभी बैठकर ठहाके लगाते थे और उनकी पत्नियां उन्हें यूं हंसते-मुस्कराते देखकर खुश होती थीं, अब सुनसान थीं। बिना उनके ये घर घर नहीं लगता था। दोनों बहनों के बीच बहुत कम बात होती थी। क्योंकि उन्हें आपस में सिर्फ़ लड़ना आता। परिवार के बाक़ी सदस्य उनके पास लॉकडाउन की वजह से आ नहीं सकते थे। ऐसे कई रिश्ते थे उनकी ज़िंदगी में, जिन्हें उनकी फ़िक्र थी, लेकिन कोरोना-काल की विपत्ति में सब बेबस थे।

वापस आने पर जो भी रसोई में बचा था दोनों ने खाया और अपने-अपने कमरों में सोने चली गईं। उन्होंने दरवाज़ों को खुला रखा, क्योंकि दरवाज़ा बंद करने पर उन्हें अपने पतियों की और याद आने लगती। उस घर में एक नौकर हमेशा मौजूद रहता था, पर लॉकडाउन के चलते वह भी अपने गांव में फंसा था। वो दोनों उकताकर अपने-अपने फ़ोन ज़्यादातर ऑफ़ रखने लगीं। जिसके फ़ोन का इंतज़ार रहता था, वह तो अब कभी करने वाला ही नहीं है, इसलिए क्या करना फ़ोन ऑन रखके।

लेकिन उस दिन ना जाने क्या था, जो छोटी बहन को सोने नहीं दे रहा था। वो बार-बार बेचैन होकर बैठ जाती। वैसे तो यह रोज़ की थी, लेकिन उस दिन उसे अपने पति की कुछ ज़्यादा याद आ रही थी। वह रोने लगी। जब मन बेहद घबरा गया तो उसने फ़ोन ऑन किया।

फोन चालू करते ही वॉट्सएप्प के ढेरों अनरीड मैसेज ब्लिंक करने लगे। एक नम्बर को देखकर वह चौंक गई! ऐसा कैसे हो सकता है, यह तो उसके पति का नम्बर था। वह मैसेज खोलती है तो उसमें एक फ़ोन नम्बर होता है और उस पर लिखा होता है प्लीज़ इस पर कॉन्टैक्ट करो। वो मन में ढेरों सवाल लिए उस नम्बर पर डरते हुए कॉल करती है। उसे लगा ज़रूर कोई सरकारी कार्यवाही होगी। रिंग जाते ही वहां से हेलो की आवाज़ आती है।

-हेलो मैडम, आप मिसेज़ कैरी बोल रही हैं? बेहद घबराई आवाज़ में वह बोलती है- हां!

-आपके लिए एक अच्छी ख़बर है, जो सात लोग मृत घोषित किए गए थे, उनमें आपके पति का नाम नहीं है। वो बीमार थे और दूसरे अस्पताल में भर्ती थे। एक ही नाम का होने की वजह से ग़लती हो गई। वो अभी अस्पताल में भर्ती हैं। फ़िलहाल वो स्वस्थ हैं और जल्दी ही आपसे बात करेंगे। गुड नाइट। ये कह कहकर फ़ोन काट दिया जाता है। उसने दु:खों को अंधेरी गली में जाते देखा, पीली रोशनी के बल्ब में चीज़ों के धुंधले-से आकार नज़र आ रहे थे। मानो भारी उथल-पुथल के बीच आकारों की नई दुनिया उभर रही हो। उसका मन ख़ुशी से भर गया और सांस जैसे अटक गई। वो भागकर बहन के कमरे में जाती है, लेकिन कमरे के दरवाजे़ पर ठिठक जाती है। बेचारी शैली... उसने मन ही मन सोचा... क्या उसे बताना ठीक होगा? मेरी ख़ुशी से बहन का दु:ख बढ़ जाएगा। इस बात को फ़िलहाल अपने तक रखना ही सही होगा।

वह बहन के पास जाती है। देखती है शैली चैन की नींद सोई हुई थी। उसका आधा चेहरा तकिए में छुपा था। जैसे अभी-अभी रोकर सोई होगी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी। वह थोड़ा करवट लेती है तो चेहरे पर सजीव-सी मुस्कराहट बिखर जाती है, जिनमें ख़ुशी के भाव थे। हालांकि पलकें बंद थी। फिर भी ऐसा लग रहा था कि शब्द फूट पड़ेंगे। मन में कितना भी दु:ख हो, नींद उन्हें धीरे-धीरे चुराकर ख़ुशनुमा सपनों में तब्दील कर देती है। रात काफ़ी ढल चुकी थी। कैरी बिना कुछ बोले अपने कमरे में वापस आ जाती है।

शैली को लगता है जैसे नींद में कोई उसे जगा रहा हो। नींद की ख़ुमारी में कैरी को जाते देखती है, तो कह बैठती है- सॉरी कैरी, मैं इतनी ख़ुश हूं कि बयां करना मुश्किल है। तुम मुश्किल से हालात से समझौता करके सम्भली हो। मैं नहीं चाहती तुम मेरी ख़ुशी को महसूस करके अपने भाग्य को दोष दो, मेरी बहन। जो होगा देखा जाएगा। फ़िलहाल मैं तुम्हें यह नहीं दिखा सकती हूं। वह अपनी बाईं हथेली को सीधा करके अपने मोबाइल में आए और कई बार पढ़े जा चुके मेल को फिर से एक बार पढ़ती है, जिसमें लिखा होता है-

प्रिय शैली, आपसे सम्पर्क करने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन आपका मोबाइल हमेशा बंद रहता है। इसलिए मेल कर रहा हूं कि जिस शिप को समुद्री लुटेरों द्वारा लूटा गया था, पर आशंका थी कि सभी कर्मचारी मारे गए, उसके बारे में पता चला है कि लाइफ़बोट के ज़रिए तीन-चार लोग उस पर से भागने में क़ामयाब हो गए थे। उनमे से एक आपके पति भी थे। मैंने उन्हें ख़ुद अपनी आंखों से सुरक्षित देखा है और वो जल्द ही वापस आएंगे।

शैली इस मैसेज को कई बार पढ़ती है। फिर कैरी के पास बिस्तर पर जाकर उसके सर को प्यार से सहलाती है, मेरी छोटी बहन, मैं तुम्हें अपनी ख़ुशी बताकर दु:खी नहीं कर सकती। तभी फ़ोन की घंटी बजती है और वह जाग जाती है।

(नीतू मुकुल)