12वीं पास ने जामुन से बनाई 2 करोड़ की कंपनी
दोपहर के करीब एक बज रहे हैं। उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों के बीच जसवंतगढ़ का इलाका। हाई-वे के दोनों तरफ पहाड़, मनमोहक नजारे। कुछ दूर आगे बढ़ने पर दर्जनभर से अधिक आदिवासी महिलाएं बगीचे में जामुन चुन रही हैं। उसे एक कंटेनर में इकठ्ठा कर रही हैं।
इन महिलाओं के बीच 36 साल के राजेश ओझा पेड़ की निचली टहनियों से लटकते जामुन के फल को तोड़ रहे हैं। उसकी क्वालिटी, फल के साइज को देखने के बाद कंटेनर में रख रहे हैं। महिलाओं के झुंड में उन्हें देखकर मैं चौंक जाता हूं। उनसे ही तो मिलने मैं राजस्थान आया हूं।
राजेश मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘आइए, आप भी जामुन खाइए। इसी जामुन से हम 7 से अधिक तरह के प्रोडक्ट तैयार करते हैं। यह हेल्थ के साथ-साथ कमाई और रोजगार का भी जरिया है। हमारी कंपनी ‘ट्राइबलवेदा’ का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ से अधिक का है।’
राजेश के साथ जो महिलाएं काम कर रही हैं, वो ठेठ मेवाड़ी बोल रही हैं। हिंदी भी उन्हें नहीं समझ में आ रही है। एक महिला है, जो कुछ-कुछ हिंदी समझ रही है।
मेरे पूछने पर वो कहती हैं, ‘कुछ साल पहले तक सीजन के हिसाब से ही हम लोग जामुन को तोड़ते थे। फिर इसे घूम-घूमकर गांव-गांव या मंडी में जाकर औने-पौने भाव में बेचते थे। हम सब को पता था कि अगर जामुन आज नहीं बिकेगा, तो कल खराब हो जाएगा।
जब से भइया (राजेश) के साथ काम कर रहे हैं, तब से हम लोगों को पूरे साल काम करने को मिल रहा है। जामुन के वाजिब रेट भी मिल रहे हैं। गांव-गांव घूमकर बेचने का झंझट भी नहीं।’
इस बीच जामुन के पेड़ पर बैठा एक व्यक्ति आवाज लगाने लगता है। अब ऊपर की तरफ जामुन नहीं है, मैं उतर रहा हूं। पेड़ के सहारे लगी एक सीढ़ी को राजेश कसकर पकड़ लेते हैं। कहते हैं, ‘जामुन का पेड़ कोमल भी होता है। इसकी टहनियों के टूटने का डर ज्यादा रहता है।’
सभी महिलाएं जामुन के फल से भरे कंटेनर को सिर पर लादे एक स्टोर की तरफ बढ़ने लगती हैं। मैं भी राकेश के साथ उनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की तरफ बढ़ता हूं।
राकेश मुझे जामुन से प्रोडक्ट बनाने की शुरुआत करने के पीछे की कहानी बताते हैं।
कहते हैं, 'तकरीबन 14 साल हो गए थे मुंबई में काम करते हुए। इस दौरान मैंने कई छोटे-बड़े काम किए। 2016 का साल बीत रहा था। अपने गांव आया हुआ था। एक रोज ऐसे ही घूमते हुए इधर आ गया। ये आदिवासी गांव है। यहां पहाड़ों पर जामुन और सीताफल के असंख्य पेड़ आपको मिल जाएंगे।
एक दिन ऐसे ही मैंने जामुन तोड़ने और इसे घूम-घूमकर बेचने वाली कुछ महिलाओं से पूछा कि वो इससे कितना पैसा कमा लेती हैं। महिलाओं ने जो बात बताई, उसे सुनने के बाद मैं हिल गया।
महिलाओं का कहना था कि जामुन को बेचकर जो पैसे वो कमाती हैं, उसी से उन्हें पूरे साल अपना घर चलाना पड़ता है। दाल-रोटी का खर्च इसी जामुन को बेचकर निकलता है। मंडी में बेचो या किसी बिजनेसमैन को दो, दोनों ही कम कीमत पर जामुन खरीदते हैं। सब अपना फायदा देखते हैं। मनमाना कीमत लगाते हैं। उन्हें पता होता है कि यदि ये जामुन आज नहीं बिका, तो कल कोई नहीं पूछेगा। यही हमारी मजबूरी है।
इस बातचीत के बाद मैं सोचता रहा कि आखिर इस जामुन का क्या कर सकते हैं। तब तक कुछ बड़ी कंपनियां जामुन से सिरका और इसके सीड से पाउडर तैयार कर रही थीं, लेकिन छोटे लेवल पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। इन महिलाओं से कोई डायरेक्ट जामुन नहीं खरीद रहा था, ताकि इन्हें फायदा हो। बिचौलिया हर जगह मौजूद थे।’
हम राजेश की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में पहुंचते हैं। हर तरफ जामुन की खुशबू आ रही है। कुछ मशीनों के चलने की भी आवाज आ रही है। एक तरफ स्टोर में महिलाएं जामुन से भरे कंटेनर को रख रही हैं। उसकी छंटाई कर रही हैं। दूसरी तरफ ग्लव्स और हेडकैप पहनी दो दर्जन से अधिक महिलाएं जामुन से पल्प और सीड को अलग कर रही हैं।
सामने फील्ड में बीज सुखाया जा रहा है। एक महिला बीजों को कांटेदार रॉड के सहारे उलट-पुलट कर रही है, ताकि वो अच्छी तरह से सूख जाएं।
जिस तरह का पूरा सिस्टम नजर आ रहा है, लग रहा है कि राजेश ने मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रखी है।
मैं उनसे पूछता हूं- आपने कहां तक पढ़ाई की है?
राजेश कहते हैं- बारहवीं तक, वो भी मुश्किल से…
मैं चौंकते हुए दोहराता हूं- बारहवीं तक
राजेश की हंसी छूट जाती है। कहते हैं, ‘मेवाड़ बेल्ट में पढ़ाई-लिखाई का उतना कल्चर नहीं रहा है। ये 2002 की बात है। उस वक्त तक मेरे गांव में हर कोई 10वीं-12वीं ही पास था। पापा की एक दुकान थी, जिससे घर चलता था। जमीन भी नहीं थी कि खेतीबाड़ी हो सके।
12वीं पास करने के बाद घर का बोझ उठाने का दबाव था। मेरे कुछ जानने वाले मुंबई में रहते थे। दरअसल, हमारे इलाके के अधिकांश लोग पेट पालने के लिए मुंबई का ही रुख करते हैं। मैं भी मुंबई चला गया।
16 साल की उम्र थी। 12वीं पास को भला कौन नौकरी देता। कई महीने इधर-उधर चक्कर काटने के बाद सेल्समैन की नौकरी मिली। मॉल में सामान बेचता था। फिर उसके बाद दुकान-दुकान जाकर प्रोडक्ट बेचने का काम किया। ज्वेलरी शॉप पर भी काम किया। इसी तरह से 14 साल गुजर गए।'
राजेश बताते हैं, 'मुंबई जैसे शहर में रहना, कम पैसों में सर्वाइव करना किसी चुनौती से कम नहीं। धीरे-धीरे जब थोड़ा-बहुत एक्सपीरिएंस हुआ, तब मार्केटिंग सेक्टर में काम मिलने लगा। जब 2016 में मैंने जामुन से प्रोडक्ट तैयार करना शुरू किया, तो मुझे इसके बारे में कोई भी नॉलेज नहीं थी।
न तो एग्रीकल्चर बैकग्राउंड था, न ही पापा के पास जमीन-जायदाद। जितने में घर था, उतनी ही जमीन हमारे पास थी। गांव के लोगों से बात करना, जामुन की क्वालिटी, इसके रखरखाव… इनकी समझ तो कुछ महीने में ही हो गई, लेकिन असल चुनौती इससे प्रोडक्ट बनाने को लेकर थी।
मैंने उदयपुर की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफेसर से बात की, उन्हें अपना आइडिया शेयर किया तो वे बड़े खुश हुए। दरअसल, ये लोग पहले से जामुन से प्रोडक्ट तैयार करने को लेकर काम कर रहे थे। करीब 15 दिनों में मैंने सिर्फ प्रोडक्ट बनाने के प्रोसेस को समझा।
उसके बाद अपनी यूनिट में इसको लेकर एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया। करीब एक साल लग गए प्रोडक्ट को तैयार करने में।’
मुंबई से लौटकर गांव में बिजनेस, घरवालों ने विरोध नहीं किया?
राजेश थोड़ा मायूस हो जाते हैं। कारण पूछने पर कहते हैं, ‘किडनी फेल होने की वजह से 2014 में पापा की डेथ हो गई थी। घर की जिम्मेदारी पूरी तरह से मेरे कंधों पर आ गई थी। हालांकि जब मैंने कंपनी की शुरुआत की, तब तक शादी हो चुकी थी।
ससुराल वालों को लग रहा था कि जब शादी हुई, तो लड़का मुंबई में था। कॉर्पोरेट जॉब कर रहा था। शादी के एक साल बाद ही गांव लौट गया, पता नहीं क्या करेगा। हालांकि पत्नी को यकीन था कि मैं कुछ बेहतर करूंगा।
इस कंपनी को शुरू करने के लिए करीब 6-7 लाख रुपए की जरूरत थी। इतनी सेविंग्स एक मिडिल क्लास फैमिली के पास कहां होती है। पापा के इलाज में भी बहुत पैसे खर्च हो चुके थे। एक लाख रुपए मेरे पास थे। बाकी के पैसे मैंने कर्ज लेकर, बैंक से लोन लेकर जुटाए।’
मेरी बातचीत के बीच राजेश से बात करने के लिए एक लड़की आती है। राजेश परिचय देते हुए कहते हैं। ये हमारी सोशल मीडिया देखती हैं। मुंबई से आज सुबह ही आई हैं। प्रोडक्ट प्रमोशन को लेकर कुछ शूट था।
राजेश के पास अभी हर रोज वेबसाइट और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए 200 से अधिक ऑर्डर आते हैं। राजेश इसके पीछे मार्केट स्ट्रैटजी बताते हैं।
कहते हैं, ‘शुरुआत में बमुश्किल हफ्ते में दो-चार ऑर्डर आते थे। अब आप प्रोडक्ट बनाएंगे, तो उसे बेचना भी तो पड़ेगा। हम जामुन सिरका, जामुन स्ट्रिप, जामुन टी, जामुन सीड पाउडर, जामुन नीम करेला…. समेत कई तरह के प्रोडक्ट बनाते हैं।
मैंने उदयपुर समेत अलग-अलग शहरों में होने वाले एग्जीबिशन सेंटर में जाना शुरू कर दिया। वहां कई राज्यों के कस्टमर हमारे कॉन्टैक्ट में आए। प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ने लगी। आज पैन इंडिया हमारे प्रोडक्ट की सप्लाई है।
सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, गुजरात और साउथ इंडिया में इसकी डिमांड है। सीजन में हर रोज 5,000 किलोग्राम जामुन की प्रोसेसिंग होती है।’
स्टोर में कुछ महिलाएं जामुन के दर्जनों कंटेनर को एक के ऊपर एक करके रख रही हैं। राजेश बताते हैं कि ये कंटेनर आसपास के 25 से ज्यादा गांवों से कलेक्ट होकर आते हैं।
हर गांव में कलेक्शन सेंटर बना हुआ है। जहां सबसे पहले जामुन को कलेक्ट किया जाता है। अभी 40 रुपए किलोग्राम के हिसाब से जामुन का रेट तय हो रहा है।
इन्हीं गांवों की महिलाएं यूनिट में काम करने के लिए आती हैं। जामुन से प्रोडक्ट बनाने के प्रोसेस को कम्प्लीट करती हैं।
राजेश कहते हैं, ‘जामुन एक सीजन का ही फल है। मुश्किल से एक महीने मार्केट में उपलब्ध रहता है, लेकिन अब कोई भी पूरे साल जामुन खा सकता है। इन महिलाओं को हम पूरे साल रोजगार दे रहे हैं। इससे जब इनका चूल्हा जलता है, तो मुझे बहुत खुशी होती है कि मैं रोजगार के साथ-साथ मानवता का भी काम कर रहा हूं।'
बातचीत के बीच राजेश के साथी अविनाश आते हैं, जो कंपनी के ऑपरेशन को देखते हैं। अविनाश ने MBA की पढ़ाई की है। वो राजेश से जामुन के कलेक्शन को लेकर कुछ डेटा शेयर करते हैं, फिर चले जाते हैं।
राजेश मुझे अब इससे बने प्रोडक्ट और पल्प को दिखाते हैं। एक फ्रिज का टेम्प्रेचर धीरे-धीरे माइनस में जा रहा है। राजेश कहते हैं, ‘-35 डिग्री पर इसे तीन दिनों तक फ्रीजर में रखा जाता है। इससे ये पूरी तरह से जम जाता है।
Kumkum sharma 

