वेस्ट मटेरियल से 600 करोड़ का बिजनेस
‘दादा छोटे किसान थे। सालभर परिवार का खाने का गुजारा हो जाए, इतनी ही खेती हो पाती थी। पापा जब 8 साल के थे, तो उनकी मां यानी मेरी दादी का देहांत हो गया। पापा का पूरा बचपन तंगी में गुजरा, लेकिन उन्हें हमेशा अपनी मां की बात याद रहती थी।
उनकी मां कहा करती थीं- बेटा गरीबी से यदि निकलना है, तो अच्छे से पढ़ाई करो। यही वजह थी कि जैसे-तैसे करके पापा ने अपनी पढ़ाई कम्प्लीट की।
छत्तीसगढ़ के भिलाई में उनकी जॉब लग गई। यहां से हम लोगों के हालात थोड़े सुधरे। मिडिल क्लास फैमिली से निकला लड़का कहां बिजनेस करने के बारे में सोचता है, लेकिन मैंने ये रिस्क लिया। एक समय ऐसा भी आया जब न्यूयॉर्क का घर बेचना पड़ गया। आज हम जिस कंपनी की बात कर रहे हैं, उसका सालाना टर्नओवर 600 करोड़ से अधिक का है।’
मैं अभी दिल्ली से सटे नोएडा सेक्टर 142 में हूं। एक बड़ा-सा ऑफिस, जिसमें 100 से ज्यादा लोगों की टीम किसी सॉफ्टवेयर कंपनी की तरह काम कर रही है। यहीं पर मेरी बात ‘EcoSoul’ के को-फाउंडर राहुल सिंह से हो रही है। उनकी टेबल पर डिस्पोजेबल आइटम्स जैसे थाली, पत्तल, कटोरी, कटलरी, चम्मच जैसे प्रोडक्ट्स के बंडल रखे हुए हैं।
जिस केबिन में राहुल के साथ मेरी बातचीत हो रही है, उसके ठीक सामने एक स्टोर रूम में यही सारे प्रोडक्ट्स थोक में रखे हुए हैं। मैं इन आइटम्स को देखकर चौंक जाता हूं। राहुल से पूछता हूं- 'आप ही ये सारे प्रोडक्ट्स बनाते हैं।'
राहुल हंसते हुए कहते हैं, ‘ये सारे वेस्ट मटेरियल से बना हुआ प्रोडक्ट है। जैसे कि ये ग्लास आपको प्लास्टिक से बना हुआ दिख रहा होगा, लेकिन ये मक्का से बना हुआ है। उसी तरह से ये कटोरी, प्लेट गन्ने के छिलके से यानी शुगर मिल से जो वेस्ट निकलता है, उससे बना हुए हैं।
अब आप सोच सकते हैं कि किसी के लिए ये कचरा है, वेस्ट है, लेकिन मेरे लिए तो सोना है। दरअसल, हम सोने की खदान पर बैठे हुए हैं। इंडिया में इस सेक्टर का मार्केट साइज 7 हजार करोड़ से अधिक का है। 95% शुगर वेस्टेज को हम हर साल जला देते हैं। अपने यहां कचरे का कोई मोल नहीं है और चीन इसे इंपोर्ट करता है।
अभी हम इन वेस्टेज से 43 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बना रहे हैं। ये सारे प्रोडक्ट्स हम एक्सपोर्ट करने के पैरामीटर्स के मुताबिक तैयार करते हैं।’
… तो आप भिलाई के रहने वाले हैं।
राहुल एक तस्वीर दिखाते हैं, जो उनकी फैमिली फोटो है। वो कहते हैं, ‘हम लोग तो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले हैं। पापा जब भिलाई आ गए, तो उसके बाद से हम लोग यहीं पर शिफ्ट हो गए। तब से भिलाई के ही होकर रह गए।
हालांकि मेरे कुछ रिलेटिव्स आज भी सहारनपुर में रहते हैं। वहीं पर ये लोग खेती-बाड़ी करके अपना गुजारा करते हैं।’
राहुल की केबिन के एक कॉर्नर में उनके बच्चे की तस्वीर रखी हुई है। अपने बच्चे की तस्वीर देख राहुल को बचपन की बातें याद आ रही हैं। वो कहते हैं, ‘कभी सोचा नहीं था कि इतना सब कुछ हो जाएगा, हालांकि ये सब एक दिन में नहीं हुआ।
जो कुछ भी आज आप देख रहे हैं, ये दो दशक की कमाई का नतीजा है। मैं बेहद सामान्य परिवार से ताल्लुक रखता हूं। आपको शुरुआती दिनों की एक बात बताता हूं। हम दो भाई हैं। पापा की जॉब पर ही पूरे घर का खर्च टिका हुआ था। आप भी सैलरी क्लास हैं, तो स्थिति समझ सकते हैं।
जब मैं 12वीं में था, तो ट्यूशन फीस देने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे। दरअसल, मुझे आईआईटी की तैयारी करनी थी। ये साल 2000 के आस-पास की बात है। आज की तरह उस समय भी तैयारी के लिए कोटा-दिल्ली जाने का और बड़े-बड़े नामी इंस्टीट्यूट में पढ़ने का क्रेज था।
जब मैंने पापा से कहा कि मुझे भी आईआईटी की तैयारी के लिए जाना है, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उनका जवाब था- कहां से इतने पैसे आएंगे। लोन लेकर तो घर बनाया है। अब और कर्ज नहीं ले सकता। पापा भी कुछ नहीं कर सकते थे। उनकी भी अपनी मजबूरी थी।
मैंने सेल्फ स्टडी करनी शुरू की। मेहनत रंग लाई। NIT में एडमिशन लेने में कामयाब हुआ।’
बातचीत के बीच ही राहुल का मोबाइल फोन बजता है। कुछ देर बाद फोन रखते हुए राहुल कहते हैं, ‘अमेरिका में रह रहे मेरे एक दोस्त का फोन था। करीब 15 साल मैं भी वहां रहा हूं न।’
भिलाई से सीधे अमेरिका?
राहुल मुस्कुराने लगते हैं। कहते हैं, ‘इंडिया में हर मां-बाप का यही सपना होता है कि उसका बेटा-बेटी विदेश में रहे। वहां कमाए। मेरे साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ। इंजीनियरिंग करने के बाद पहले मैंने XLRI जमशेदपुर से MBA किया, फिर जॉब के सिलसिले में न्यूयॉर्क चला गया।
वहां की एक बड़ी कंपनी में मैं ग्लोबल हेड था। एक लंबा वक्त अमेरिका में बिताया। इस दौरान कई सारे नेटवर्क भी बने, जिसकी बदौलत मैं आज इस बिजनेस को चला रहा हूं। आपको 2016-17 की बात बताता हूं, जिसके बाद मुझे इंडिया लौटना पड़ा।'
वो कहते हैं, ‘मेरा भाई भी विदेश में ही रहता था और भिलाई में मम्मी-पापा। एक रोज पापा को हार्ट अटैक आ गया। बड़ी मुश्किल से हम उस सिचुएशन से निकल पाए।
आप ही बताइए न ! यदि समय पर हम अपने मां-बाप के पास नहीं पहुंच सकते हैं, उनकी ठीक से केयर नहीं कर सकते हैं, तो फिर इन पैसों का क्या मतलब? मेरे भाई ने कहा- हम दोनों विदेश में ही रहते हैं। जिस तरह से पापा की स्थिति खराब हो जाती है, यदि कुछ हो गया तो…। मैं वापस इंडिया जा रहा हूं। तुम भी आ जाओ। कुछ महीने बाद ही वो वापस आ गया।’
फिर आपका इंडिया कैसे आना हुआ?
राहुल मुस्कुराते हुए जवाब देते हैं, ‘अपने घर कौन नहीं आना चाहता है। मैं तो बस मौके की तलाश में था। थोड़ी दिक्कतें तो थीं क्योंकि न्यूयॉर्क में मैं अपना घर खरीद चुका था। सब कुछ सेटल्ड था। 2019 की बात है। मैं जिस कंपनी में काम कर रहा था, वो अपना कुछ प्रोजेक्ट इंडिया में लॉन्च करने वाली थी।
उस वक्त तक सस्टेनेबिलिटी को लेकर काफी बहस चल रही थी। मैं भी सोच रहा था कि इसके लिए क्या कर सकते हैं। सब कुछ अच्छा होता, तभी कोरोना ने दस्तक दे दी। कंपनी ने अपना प्रोजेक्ट वापस ले लिया।
लेकिन मैं तय कर चुका था कि अब इंडिया तो लौटना ही है, लेकिन दिक्कत ये भी थी कि यहां वापस आकर करूंगा क्या।’
फिर ये वेस्टेज से प्रोडक्ट्स बनाने का ख्याल?
राहुल कहते हैं, ‘जब मैं अपने गांव जाता था तो देखता था कि लोग डिस्पोजेबल आइटम्स यूज तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें ये पता नहीं है कि आखिर ये प्रोडक्ट बना किससे है या कितना बायोडिग्रेडेबल है। इंडिया में पहले भी इस तरह के प्रोडक्ट बन रहे थे, लेकिन एक्सपोर्ट के लिहाज से तो बिल्कुल भी नहीं बन रहा था।
मैं सोचता था कि जब सभी प्रोडक्ट्स के अपने ब्रांड हो सकते हैं, तो फिर इन प्रोडक्ट्स के क्यों नहीं। रिसर्च करने पर पता चला कि लोकल लेवल पर लोग रद्दी से भी प्लेट, कटोरी बना दे रहे हैं। कोई पैरामीटर ही नहीं है। अब आप समझ सकते हैं कि ये हेल्थ के लिए भी कितना नुकसानदेह है।’
राहुल मुझे कुछ प्रोडक्ट्स पैकेट से निकालकर दिखाते हैं। वो कहते हैं, ‘आप जो भी प्रोडक्ट देख रहे हैं, वो सारे प्रोडक्ट हम वेस्ट मटेरियल से बनाते हैं। जैसे कुछ आइटम्स हम पाम लीफ से बनाते हैं, तो कुछ बांस के पत्ते से।
टिश्यू, नैपकिन जैसे प्रोडक्ट हम बांस के पल्प से भी तैयार करते हैं। अभी हम 43 से ज्यादा प्रोडक्ट्स ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए, अपनी वेबसाइट और एक्सपोर्ट करके बेचते हैं। पूरे बिजनेस मेरी प्रियंका का सबसे बड़ा रोल है।’
ये सारे प्रोडक्ट्स आपकी यूनिट में बनते हैं?
राहुल कहते हैं, ‘अब जो प्रोडक्ट गन्ने के छिलके से बनने वाले हैं, वो मुजफ्फरनगर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में बनते हैं। जबकि दूसरे प्रोडक्ट जैसे पाम लीफ से बनने वाले प्रोडक्ट कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में बनते हैं। बैंबू रिलेटेड प्रोडक्ट त्रिपुरा में बनते हैं।’
राहुल ने इस बिजनेस की शुरुआत 20 करोड़ रुपए के इन्वेस्टमेंट से की थी। वो कहते हैं, ‘मैंने न्यूयॉर्क का अपना घर बेचकर इस बिजनेस को खड़ा किया था। दरअसल, जब मैंने EcoSoul की शुरुआत की, सबसे पहले एक्सपोर्ट करना ही शुरू किया था, लेकिन कोविड में लगे लॉकडाउन के बाद रॉ मटेरियल की कॉस्ट बढ़ गई।
अब मान लीजिए कि एक्सपोर्ट के लिए जो कंटेनर 10 हजार डॉलर में डील हुआ था, उसकी कीमत 20 हजार डॉलर हो गई। अब हमने तो क्लाइंट से एक फिक्स रेट पर डील कर लिया था। इसी में बड़ा नुकसान हुआ। एक वक्त ऐसा भी आया कि तकरीबन 3 महीने हमें जमीन पर सोना पड़ा।’
राहुल को वो वाकया भी याद आ रहा हैं, जब उन्होंने इस बिजनेस की शुरुआत की थी, तो लोग अपने पास बैठने भी नहीं देना चाहते थे।
वो कहते हैं, ‘जब मैंने इको-फ्रेंडली पत्तल-कटोरी बनाना शुरू किया और इंडिया में जो छोटे कारीगर, मैन्युफैक्चरर पहले से काम कर रहे थे, उनके पास जाने लगा, तो कोई मुझे बैठने तक के लिए नहीं कहता था।
जब मैं उन्हें अपने आइडिया के बारे में बताता, तो वो यही कहते- आप हैं कौन? मैं आपके लिए क्यों प्रोडक्ट बनाऊं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी मिले, जिन्होंने मेरे कॉन्सेप्ट को समझा और आज हम यहां पर हैं। आज हमारे साथ दुनियाभर के 150 से ज्यादा मैन्युफैक्चरर जुड़े हुए हैं। 10 से ज्यादा देशों में हम अपने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट कर रहे हैं।
हम महिलाओं के लिए भी काम कर रहे हैं। हमारी कंपनी में अधिकांश महिलाएं ही मिलेंगी। ये वो महिलाएं हैं, जिनके पास हुनर तो है, लेकिन पहले इन्हें काम नहीं मिल पा रहा था। आज ये शान से हर महीने अच्छी-खासी आमदनी कर रही हैं।'
'पापा पहले साइकिल पर घूम-घूमकर कपड़ा बेचा करते थे, फिर बाद में उन्होंने अपने घर पर ही एक किराने की दुकान खोल ली। इसी से हम लोगों का गुजारा होता था। मैंने इंजीनियरिंग करने के दौरान ही एक वेबसाइट डेवलपिंग कंपनी बनाई। बाद में इस कंपनी का टर्नओवर 40 करोड़ से अधिक था। एक दिन रातों रात ये कंपनी गायब हो गई। बात मरने-जीने पर आ गई। आज जिस कंपनी को लेकर हम लोग बातचीत कर रहे हैं, उसकी वैल्यूएशन 300 करोड़ है।'
Kumkum sharma 

