अंतस आनंद:रोमांस प्रेम नहीं है, प्रेम की परतें और प्रेम की शर्तें होती हैं बहुत अलग

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अंतस आनंद:रोमांस प्रेम नहीं है, प्रेम की परतें और प्रेम की शर्तें होती हैं बहुत अलग
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रोमांस को प्रेम समझ बैठने के इस दौर में क्या आश्चर्य कि प्रेम की सिर्फ़ कल्पना ही है, हक़ीक़त में यह कहीं नज़र नहीं आता। ऐसे विकट समय में प्रेम की परतों और प्रेम की शर्तों को सामने ला रहे हैं येे सूत्र।

प्रेम के उत्सव की पदचाप सुनाई दे रही है। गली-गली प्रेम का जश्न मनाया जाएगा। अभी से वातावरण रूमानी आभा से रंगीन है, प्रेम का इज़हार करते हुए छोटे-छोटे तोहफ़े, शानदार लाल गुलाब और गुलाबी दिलों से सजे ख़ूूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड बाज़ार में भरे हैं। मन में होनेवाली गुदगुदी से हवा रोमांचित है। शायद रोमांस और प्रेम के जज़्बात से भरे कई युवाओं को पता भी नहीं होगा कि जिस वैलेंटाइन के नाम से वे यह प्रेम दिवस मना रहे हैं उसने कभी प्रेमी युगलों को मिलवाने के लिए अपनी जान दे दी थी।

दरअसल, प्रेम न तब स्वीकृत था, न अब है क्योंकि यह हृदय में खिलने वाला एक जंगली फूल है जिसे बांधा नहीं जा सकता और न रोका जा सकता है। वह स्वच्छंद है, स्वतंत्र है और कहीं भी अकस्मात खिलता है। प्रेम में जो व्यक्ति उतरा उसके पास न जाने कौन-सी रूहानी ताक़त आ जाती है जिसकी बदौलत वह दुनिया की किसी भी शख़्सियत से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। शायद इसीलिए समाज और नीति के जो रक्षक हैं वे प्रेम को फौरन कुचल देते हैं। विवाह से वे भयभीत नहीं हैं क्योंकि विवाह सुरक्षित है, उसका नाम ही बंधन है। जिसकी बुनियाद ही बंधन में है उससे कोई नहीं डरता। विवाह में बग़ावत या स्वतंत्रता के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती, अत: समाज को विवाह से कोई ख़तरा नहीं है। लेकिन प्रेम तो कोई नियम-क़ानून नहीं मानता इसीलिए वह समाज की स्थिर व्यवस्था को चुनौती देता है।

अफ़सोस, आधुनिक प्रेम ‘आई लव यू’ में ही सिमटकर रह गया है। अधिकतर लोगों को प्रेम दर्शाते हुए एक संकोच-सा होता है। प्रेम फिल्मों में, कविताओं में और उपन्यासों में तो भरपूर दिखाई देता है, हक़ीक़त में बिलकुल नहीं। प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम ने बड़ी ख़ूबसूरती से कहा है, ‘आज मैं किसी के मुंह से प्रेम और भक्ति ये शब्द सुनती भी हूं तो ऐसे घबराए हुए से, मानो दूसरों के बाग़ में से चुराए हुए फूल हों।’ समाज ने प्रेम के इर्द-गिर्द जो अपराध-भाव का जाल बुना है उससे वाक़ई ऐसा लगता है कि किसी से प्रेम हुआ यानी चोरी कर रहे हैं। हर व्यक्ति में प्रेम सिर्फ़ एक बीज रूप होता है, उस बीज को बोना पड़ता है, उसकी देखभाल करनी पड़ती है, उसके बढ़ने की बाट जोहनी पड़ती है। अगर यह सब नहीं किया तो प्रेम सुप्त अवस्था में छिपा रह जाएगा।

मन में बना रहे, जीवन में बसा रहे प्रेम
जीवन की साधारण वस्तुएं अधिक महत्वपूर्ण होती हैं प्रेम की शायरी के बजाय। रोमांस को प्रेम मत कहें। रोमांस एक स्वप्न, कविता, फ़ंतासी ज़्यादा होता है, उसकी जड़ें ज़मीन में नहीं होतीं, कल्पना में होती हैं। ओशो के ये सूत्र सच्चे प्रेम को समझने और जीवन को प्रेममय बनाने में सहायक होंगे-

एक-दूसरे के मालिक न बनें...

यदि प्रेमी के साथ रहना है तो एक-दूसरे की उपेक्षा मत करें, इस तरह जिएं कि आपका साथी एक नया व्यक्ति है और हर रोज़ आपको उसे रिझाना है, प्रसन्न करना है। आप रोज़ सुबह ताज़ा चाय चाहते हैं तो प्रेम बासा क्यों बर्दाश्त करते हैं? एक-दूसरे के मालिक मत बनें, अजनबी बने रहें। जितने अजनबी रहेंगे उतना प्रेम ताज़ा रहेगा।

प्रेम शीतल बयार की तरह...

भलीभांति समझ लें कि प्रेम स्थायी नहीं होता। वह शीतल बयार की तरह है, जो बहती है तो आप शीतलता अनुभव करते हैं और फिर वह चली जाती है। प्रेम की इस क्षणिकता के साथ रहना सीखें तो आप हमेशा प्रेम में रहेंगे। जब यह आता है, आप इतने प्रेम से भर जाते हैं कि सोच भी नहीं सकते कि यह प्रेम कभी विदा हो सकता है। ऐसे क्षणों में लोग रोमांटिक हो जाते हैं और जनम-जनम साथ रहने के वादे करते हैं जिन्हें वे बाद में पूरा नहीं कर पाते। प्रेम का अनुभव करना हो तो प्रेम को संबंध न बनाएं। व्यक्ति आए या जाए, प्रेम की आभा आपके भीतर बनी रहे।

अंतर को समझें...

पुरुष और स्त्री एक ही अस्तित्व के दो पहलू हैं लेकिन दोनों के स्वभाव बिलकुल अलग-अलग हैं। इसलिए लड़ाई-झगड़े में समय नष्ट न करके इस अंतर को समझने का प्रयत्न करिए। स्त्री हृदय में जीती है, पुरुष दिमाग़ में। प्रेम का गणित बहुत अलग है, यहां दो और दो हमेशा चार नहीं होते; दो और दो एक भी हो सकते हैं या फिर कभी जुड़ते ही नहीं।

अहंकार है सबसे बड़ा शत्रु...

प्रेम का सबसे बड़ा शत्रु कोई है तो अहंकार। आधुनिक आदमी का अहंकार चट्टान की तरह मज़बूत हो गया है, प्रेम का झरना कैसे बहेगा? प्रेम में पिघलना शब्द आज शायद किसी के शब्दकोश में नहीं है। लेकिन यह तो प्रेम का साथी है, इसके बग़ैर प्रेम कैसे पनपेगा? इसे अपनी ज़िंदगी में पुन: स्थापित करें।

प्रेम के संग सजगता ज़रूरी...

प्रेम बड़ी जल्दी घृणा में बदल जाता है क्योंकि घृणा भीतर मौजूद ही होती है। अत: प्रेम को सफल करना हो तो भीतर जो दुर्भाव हैं उनकी सफ़ाई करनी ज़रूरी है। ईर्ष्या, क्रोध, नफ़रत, असुरक्षा, स्वामित्व के भाव प्रेम का गला घोंट देते हैं। इसलिए प्रेम के साथ ध्यान की सजगता अनिवार्य है। यदि ध्यान की जागरूकता और संतुलन प्रेम में आ जाए तो प्रेम विकसित हो सकता है। ध्यान और प्रेम दो पंख हैं जिसके सहारे मनुष्य आसमान में उड़ सकता है। अकेला प्रेम यह उड़ान भरने में असमर्थ है, क्योंकि जिसे हम प्रेम कहते हैं वह भावुकता बन जाती है। लेकिन प्रेमी यदि ध्यान का सहारा ले तो उसके प्रेम को ध्यान की शक्ति मिलेगी। ध्यान प्रेम को स्थिरता देता है, प्रेम के जख़्म सहने की ताक़त देता है।

प्रेम के लिए स्वतंत्रता ज़रूरी...

ध्यान रहे, स्वतंत्रता प्रेम की आत्मा है। आप अपने प्रेमी को जितनी स्वतंत्रता देंगे उतना प्रेम फलेगा-फूलेगा। जैसे हर फूल को खिलने के लिए अपने हिस्से का आकाश चाहिए वैसे ही हर व्यक्ति को खिलने के लिए अपना एकांत चाहिए। आप अपने भीतर जितने गहरे जाएंगे उतना ही दूसरे को आपके क़रीब आने का मौक़ा मिलेगा। उस गहराई में विशुद्ध स्नेह बचेगा, मैत्रीभाव बचेगा जो धूप की सुगंध की तरह दोनों के अंतस को सुगंधित करेगा।