केंद्र व राज्य के बीच झूल रहा ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण

केंद्र व राज्य के बीच झूल रहा ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण
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अलवर. सरिस्का बाघ परियोजना का ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण नहीं हो पाना सरिस्का, खनन, प्रशासन एवं पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है। एक साल से ज्यादा समय से ईको सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट प्लान राज्य व केन्द्र सरकार के बीच झूलता रहा है। सरिस्का बाघ परियोजना का ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण नहीं हो पाना सरिस्का, खनन, प्रशासन एवं पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है। एक साल से ज्यादा समय से ईको सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट प्लान राज्य व केन्द्र सरकार के बीच झूलता रहा है। फिलहाल यह ड्राफ्ट केन्द्र सरकार के पास है और इसके अंतिम प्रकाशन का इंतजार है।किसी भी टाइगर रिजर्व के लिए ईको सेंसेटिव जोन तय होना सबसे पहली प्राथमिकता है। ईको सेंसेटिव जोन के निर्धारण से ही टाइगर रिजर्व के आसपास होने वाली गतिविधियां तय हो पाती हैं। इसका निर्धारण नहीं होने से सरिस्का प्रशासन एवं ग्रामीणों के बीच आए दिन विवाद होते रहे हैं। वहीं ईको सेंसेटिव जोन के अभाव में खनन क्षेत्र का निर्धारण नहीं होने से टाइगर रिजर्व क्षेत्र में अवैध खनन की समस्या भी बड़ी है

ग्रामीणों की आपत्ति मिले एक साल बीत गया

ईको सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट पब्लिकेशन हुए एक साल से ज्यादा समय बीत गया। इसके बाद ड्राफ्ट पर ग्रामीणों की आपत्तियां मांगी गई। गामीणों की ओर से आपत्तियां दिए भी करीब एक साल का समय हो गया, लेकिन ईको सेंसेटिव जोन का अंतिम प्रकाशन अब तक नहीं हो पाया है।
पहले राज्य सरकार के पास अब केन्द्र के पास अटकाई
को सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट प्लान करीब एक साल राज्य सरकार के पास अटका रहा। पिछले दिनों यह ड्राफ्ट राज्य सरकार की ओर से केन्द्र सरकार को भेजा गया। अभी यह केन्द्र सरकार के विचाराधीन है। हालांकि पिछले अलवर दौरे पर आए केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने सार्वजनिक मंच पर इस ड्राफ्ट का अलवर की जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए जल्द अंतिम प्रकाशन करने का वादा किया था।
रोजगार पर पड़ रहा असर
सरिस्का के ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण नहीं होने का क्षेत्रीय लोगों के रोजगार पर बड़ा असर पड़ रहा है। सबसे बड़ा असर खनन क्षेत्र से जुड़े लोगों पर पड़ रहा है। सरिस्का के पास मार्बल का बड़ा जोन है। यहां पूर्व में बड़े पैमाने पर खनन कार्य हुआ, लेकिन बाद में पर्यावरणीय स्वीकृति के फेर में यह बंद हो गया। ईको सेंसेटिव जोन तय होने के बाद खनन क्षेत्र का अलग से निर्धारण हो सकेगा और पर्यावरणीय स्वीकृति मिलने पर खनन कार्य भी हो सकेगा। इससे बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर खुल सकेंगे।