अन्नू कपूर का खास कॉलम 'कुछ दिल ने कहा':जब सच हो गई थी सलीम ख़ान की भविष्यवाणी
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दरअसल फ़िल्म के पर्दे पर दिखने का मोह और आकर्षण इतना ज़बरदस्त है कि लाखों लोग बम्बई नगरी में हीरो बनने के सपने लेकर आते हैं। कुछ सपने साकार होते हैं तो अनगिनत टूटकर बिखर जाते हैं।
इंदौर के सलीम ख़ान भी ऐसे ही सपने संजोए हुए 50 के दशक के अंत में बंबई चले आए थे। सुंदर थे, गोरे थे और गोरे रंग की मार हम भारतीयों के लिए अंग्रेजों के शासनकाल से ही बहुत तगड़ी होती आई है। एक मानसिकता गहरे पैठ गई कि जो गोरा है वो सुंदर है और जो अंग्रेजी बोलता है वो बुद्धिमान है।
प्रसिद्ध अमेरिकी अभिनेता MORGAN FREEMAN (मॉर्गन फ्रीमैन) ने सत्य के अनमोल वचन कह दिए- It is high time we realize that English is just a language and medium of communication and not a sign or symbol of Intelligence! (अब समय आ गया है कि हम इस बात को समझें कि अंग्रेजी सिर्फ़ एक भाषा और संचार का केवल एक माध्यम है, न कि बुद्धिमत्ता का संकेत या प्रतीक!)
ख़ैर, मुझे सलीम ख़ान की अंग्रेजी से मतलब नहीं है, लेकिन यह मालूम है कि वे अपनी भाषा हिंदी-उर्दू ठीक बोलते थे। बंबई में सलीम की सुंदरता देखकर निर्माता-निर्देशक के. अमरनाथ ने उन्हें 1960 मे प्रदर्शित फ़िल्म ‘बारात’ में अभिनय का मौका दे दिया। फ़िल्म में सलीम ख़ान का बोला पहला संवाद था, ‘तू यहीं ठहर मां ,मैं भैया को देखकर आता हूं।’
उसके बाद कुछ और फिल्में मिलीं, जिनमें 1966 में प्रदर्शित सरहदी लुटेरा, छैला बाबू, दीवाना, तीसरी मंज़िल (रंगीन फ़िल्म जिसमें सलीम ख़ान को दर्शकों ने थोड़ा पहचाना क्योंकि ‘तीसरी मंज़िल’ एक बहुत ही सफल फ़िल्म थी) इत्यादि उल्लेखनीय हैं
फ़िल्म ‘सरहदी लुटेरा’ में आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी का एक युगल गीत ‘तुम मिले तो ज़िंदगी मिली, तुम मिले तो रोशनी मिली’ सलीम ख़ान और उनकी हीरोइन सुनीता पर फ़िल्माया गया है। फ़िल्म ‘छैला बाबू’ में लक्ष्मी प्यारे द्वारा संगीतबद्ध, हसरत जयपुरी द्वारा लिखित और मुकेश व लता मंगेशकर की आवाज में गाया गया एक गीत ‘क्यों झुकी झुकी हैं पलकें, मेरी जां ये बात क्या है, मेरे दिल मैं कैसे कह दूं मुझे प्यार हो गया है’ सलीम ख़ान और जे़ब रेहमान पर फ़िल्माया गया है। मैं एक भ्रांति दूर कर देना चाहता हूं, जिसे इंटरनेट पर वेबसाइट्स ने खूब फैलाया है कि सलीम ख़ान एक अभिनेता के तौर पर प्रिंस सलीम के नाम से फिल्मों में आए। यह बिल्कुल गलत है। अधिकांश क्रेडिट टाइटल्स में प्रिंस तो छोड़िए, सलीम ख़ान की जगह केवल ‘सलीम’ नाम आता है।
बहरहाल, काम मिला लेकिन वो नहीं मिला जिसकी ख़्वाहिश थी। इंसान की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद। (कैफ़ी आज़मी)
नाकामी, संघर्ष और कुंठाओं ने मजबूर कर दिया कि एक्टिंग-वेक्टिंग छोड़कर मियां कोई और रोज़गार-ए-आमद की तलाश की जाए। सो वे ग्रेट गुरुदत्त के ख़ास लेखक-निर्देशक अबरार अलवी के सहायक बन गए। दोपहर को अबरार अलवी के घर पहुंचकर कथा-पटकथा-संवाद में उनकी मदद करते, इबारत को तरतीब से लिख देते जिसे फ़ेयर कॉपी करना कहते हैं। समय के साथ सृजन क्षमता में अच्छी-ख़ासी धार भी आ गई।
ये वो ज़माना था, जब लेखक को ना तो उतना मान-सम्मान मिलता था और ना ही मेहनत के सही पैसे नसीब होते थे। जिस दौर में शीर्ष के सितारे दिलीप कुमार 10 से 12 लाख रुपए की फ़ीस लिया करते थे, तब सफल फ़िल्मों के टॉप लेखकों को मात्र 20 से 25 हजार रुपए नसीब होते थे और वो भी टुकड़ों-टुकड़ों में।
बहुत सारी क़िस्तों में मिला करते थे थोड़े से पैसे और अक्सर अपनी मेहनत की जायज़ फ़ीस के लिए बहुत बार कोई वैलिड इमरजेंसी दर्शानी पड़ती थी- जैसे बच्चों की स्कूल की फ़ीस, घर का राशन, माता-पिता या पत्नी की दवाई, घर का किराया, गोया कि जायज़ मेहनताने के लिए गिड़गिड़ाना होता था।
युवा सलीम ख़ान ये सब देखा और इस पीड़ा को महसूस भी किया और एक दिन अपने बॉस अबरार अलवी को बोल दिया, ‘एक दिन ऐसा आएगा, जब एक फ़िल्म राइटर एक स्टार अभिनेता से भी ज़्यादा फ़ीस लेगा।’ अबरार अलवी को शायद यह बात एक नौजवान का बड़बोलापन लगा हो तो उन्होंने इस कथन की पुष्टि करनी चाही और पूछा ‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि आज जब दिलीप कुमार को 12 लाख रुपए मिलते हैं तो क्या एक फ़िल्म राइटर इससे ज़्यादा फ़ीस लेगा?’
युवा सलीम ने जवाब दिया, ‘बेशक, एक वक्त आएगा जब फ़िल्म राइटर की फ़ीस फ़िल्म स्टार से ज़्यादा होगी।’ अबरार हंस पड़े और बोले, ‘ये बात तुमने मुझसे तो कह दी, मगर किसी और से ना कहना, वरना लोग तुम्हें पागल समझेंगे!’
सलीम ने कहा कि जनाब अगर यह साबित हो जाए कि फ़िल्म की कामयाबी की वजह उसका स्टार एक्टर नहीं, बल्कि उस फ़िल्म की कहानी और लेखक है तो ये संभव हो जाएगा।
ख़ैर उस वक्त बात वहीं ख़त्म हो गई। कालांतर में सलीम ख़ान की मुलाक़ात जावेद अख़्तर से हुई और दोनों ने एक युगल टीम बना ली- सलीम जावेद! मात्र 750 रुपया प्रति माह से शुरुआत हुई।
फिर उसके बाद सीता और गीता, यादों की बारात, ज़ंजीर, मजबूर, हाथ की सफ़ाई, दीवार, शोले इत्यादि फ़िल्मों की अपार सफलता ने सलीम जावेद को शीर्ष पर पहुंचा दिया।
एक बात जरूर बताना चाहता हूं कि ‘जंजीर’ का ट्रायल शो एक स्टूडियो में देखने के बाद यश चोपड़ा ने अपने सहायक रमेश तलवार को सलीम जावेद से संपर्क कर उनके (यश चोपड़ा के लिए) एक फ़िल्म लिखने को कहा।
सलीम जावेद ने अपनी फीस मांगी 2 लाख रुपए, जिसे सुनकर रमेश तलवार ने जोर का ठहाका लगा दिया और इसी मूड में सलीम जावेद के द्वारा 2 लाख फीस का ब्योरा यश चोपड़ा को सुना दिया। राइटर सलीम जावेद की ‘2 लाख रु. फीस की डिमांड’ सबके लिए खूब मखौल और ठिठोली का विषय बन गई।
यश चोपड़ा कैम्प में खूब मज़ाक उड़ा सलीम जावेद का। और फिर रिलीज़ हुई ‘जंजीर’ जिसकी सफलता ने पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को चकाचौंध कर दिया। यश चोपड़ा ने फिर अपने सहायक रमेश तलवार से कहा कि जाओ और सलीम जावेद को बोलो कि हम तैयार हैं 2 लाख रुपए देने को। फटाफट 2 लाख रुपए में साइन कर लो।
लिहाज़ा रमेश तलवार, सलीम जावेद के पास पहुँचे और बोले कि यश जी आपकी 2 लाख रुपए की फीस देने को राजी हैं। यह सुनकर सलीम जावेद बोले कि 2 लाख तो जंजीर रिलीज़ होने से पहले थी, अब हम 5 लाख रुपए लेंगे। और ऐसा ही हुआ।
और फिर आई धर्मा प्रोडक्शन के बैनर की यश जौहर की फ़िल्म ‘दोस्ताना’ जिसकी कथा, पटकथा और संवाद लिखने के लिए सलीम जावेद को बारह लाख पचास हजार रुपए की फीस मिली, साथ-साथ उन्हें ये भी मालूम चला कि इसके हीरो अमिताभ बच्चन को इस फ़िल्म का पारिश्रमिक मिला 12 लाख रुपए! यश जौहर ने सच बता दिया कि सलीम जावेद को ‘दोस्ताना’ लिखने की फीस हीरो से भी 50 हजार ज़्यादा दी गई है।
बरसों पहले एक नौजवान सलीम ख़ान की भविष्यवाणी सच हो गई। तुरंत अबरार अलवी को फोन लगाकर यह सूचना दी गई, जिसे सुनकर वे बहुत खुश हुए और बधाई देते हुए कहा कि अब राइटर्स को अपने हक़ के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा। तुम दोनों ने आगे आने वाले राइटर्स के लिए रास्ता रोशन कर दिया है।
आज सलीम ख़ान के बच्चे सलमान, अरबाज़, सोहेल, अलवीरा और अर्पिता सब ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं!
आप सबका जीवन भी सुख और समृद्धि में बीते, यही मेरी मंगलकामना है।
जय हिन्द! वंदे मातरम!
Naresh Chouhan 

