एन. रघुरामन का कॉलम:चुनौतियां जीवन का हिस्सा हैं और इनसे पूरी तरह से छुटकारा नहीं पा सकते
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अगर आप बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम से चिंतित हैं, तो ये कहानी आपके लिए है। बेंगलुरु से 28 किमी दूर छोटे-से गांव चगालेट्टी में 2010 में दस बच्चों ने मिलकर एक स्थानीय एनजीओ की मदद से 200 किताबों के साथ एक लाइब्रेरी खोली।
चाइल्ड राइट ट्रस्ट, जिसका मानना है कि हर बच्चे को चार तरह के अधिकार मिलने चाहिए- जीवन, सुरक्षा, विकास व सहभागिता का अधिकार, उसने इस चौथे सहभागिता के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अपने लिए लाइब्रेरी बनाने की अनुमति दी। इसने धीरे-धीरे लोगों के बीच बच्चों के लिए बच्चों द्वारा संभाली व मैनेज होने वाली लाइब्रेरी की छवि बनाई।
अब जल्दी से 2023 में लौटें। 13 साल बाद किताबें दस हजार हो गई हैं और ये विभिन्न क्षेत्रों-शैलियों की हैं। बच्चे खुद किताबें इकट्ठी करते हैं, सदस्यों को बुलाते हैं और किताबें बांटते हैं। उन्होंने लाइब्रेरी के लिए फंड भी जुटाया है। वे पुराने अखबार जमा करते हैं, बिजनेस से डोनेशन लेते हैं।
वे ही पढ़ाई के स्तर-उम्र समूह के आधार पर लाइब्रेरी में किताबें व्यवस्थित करते हैं। इसे सर्वश्रेष्ठ सामुदायिक पुस्तकालय का राजकीय पुरस्कार मिल चुका है, इसके अलावा इसे पूरे भारत के 125 पुस्तकालयों में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है।
इस लाइब्रेरी के प्रबंधन से जुड़े बच्चे अब नजदीकी इलाकों जैसे उडुुपी की यात्रा करते हैं और वहां बच्चों को प्रशिक्षित करते हैं कि कैसे किताबें इकट्ठी करके जमा की जाती हैं, रीडिंग लेवल के आधार पर उन्हें कैसे ग्रेडिंग दी जाती है। गांव के आसपास कुल-मिलाकर बच्चों की पढ़ाई की आदतें बेहतर हुई हैं।
इलाके का कोई भी बच्चा लाइब्रेरी में हिस्सा ले सकता है क्योंकि यह सबके लिए खुली है। लाइब्रेरी ने महामारी के दौरान कुछ बच्चों की स्क्रीन की लत से बाहर आने में भी मदद की है। महामारी के दौरान कुछ परिवारों के बच्चे जो फंस गए थे या बाद में पलायन कर गए, उनकी भी लाइब्रेरी की देखभाल करने वाले बच्चों ने पढ़ने और बाकी गतिविधियों में मदद की। एक साल से इस लाइब्रेरी को एनजीओ से मदद मिल रही है। पिछले 13 सालों से यह जगह पूरी तरह बच्चों द्वारा संचालित है।
ठीक ऐसे ही अगर आप 100 सालों तक स्वस्थ जीवन चाहते हैं, तो जापान की ओर देखने की जरूरत है, जहां प्रति व्यक्ति ऑक्टोजेरियन (80-89 साल की उम्र) की संख्या सबसे ज्यादा है। नई रिपोर्ट में सामने आया है कि 195 देशों में यहां सबसे सेहतमंद जीवनशैली है। देश का पारंपरिक खानपान ही इस सेहत की सफलता के पीछे है।
जापानी डाइट में प्रोसेस्ड खाना कम से कम होता है, खाना मौसमी होता है, इसमें बहुत सारे फल-सब्जियां, मछली, खमीरीकृत खाने जैसे सोय होता है। संतुलित-सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की कला भी आयु बढ़ाने में योगदान देती है। जापानियों की दीर्घायु का सबसे बड़ा राज है कि वे अपनी इकिगाई खोजते व कोशिश करते हैं।
इसका अर्थ है, ‘जीवन में उद्देश्य होना’ या ‘कौन-सी चीज़ जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाती है।’ इकिगाई की अवधारणा जापान में लोगों की लंबी आयु से गहरी जुड़ी है। अगर आपको अपनी इकिगाई नहीं पता या इस बारे में पक्का नहीं है कि कहां से शुरू करें तो लोगों की मदद करने का सोचें।
जापान के ओकिनावा द्वीप के कई स्थानीय निवासी 100 सालों से ज्यादा जीते हैं, वे ‘हारा हाची बू’ नियम से खाते हैं। मतलब 80% पेट भरने पर वे रुक जाते हैं। माना जाता है कि जितना जरूरत हो, उतना खाने से, ओवरईटिंग नहीं करने से एिजंग सेल्स की गति धीमी हो जाती है।
Naresh Chouhan 

