एक ऐसा मंदिर जहां कोई पुजारी नहीं:भक्त चढ़ाते हनुमान चालीसा और कंबल; फेसबुक-एपल के फाउंडर भी मुरीद
उत्तराखंड में काठगोदाम से लगभग 43 किलोमीटर की दूरी पर है कैंची धाम। यहां साल के 365 दिन रौनक बनी रहती है। देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां अपनी मनोकामना लेकर आते हैं।
क्रिकेटर विराट कोहली, हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट्स, फेसबुक के फाउंडर मार्क जुकरबर्ग और एपल के फाउंडर स्टीव जॉब्स भी बाबा के भक्त हैं।
आस्था और विश्वास की चौंकाने वाली कहानी की तलाश मुझे कैंची धाम तक लेकर आई।
कैंची धाम का नाम सुनते ही एक छवि उभरती हैं- नीम करौली बाबा की। नीम करौली बाबा को लेकर कई कहानियां भी हैं। इन कहानियों की सच्चाई को मैं करीब से सुनना चाहती थी। उसे महसूस करना चाहती थी।
काठगोदाम पहुंचने के बाद कैंची धाम पहुंचने के मेरे पास दो रास्ते थे। भवाली या फिर घोड़ाखाल। भवाली से कैंची धाम पहुंचने में 19 मिनट और धोड़ाखाल से 26 मिनट लगता है। मैंने घोड़ाखाल का रास्ता चुना। यहां से टैक्सी लेकर ही आप कैंची धाम पहुंच सकते हैं।
संकरी-सी इस सड़क पर मैं टैक्सी लेने पहुंचती हूं। यहां टैक्सियों की बारात सजी है। पैदल निकलने की भी जगह नहीं है। टैक्सी लेने के बाद मैं अपने रास्ते निकल पड़ती हूं। मंदिर के पास इतना जाम लगा है कि मुझे टैक्सी से थोड़ा-सा पहले उतरना पड़ा। सामने उत्तरवाहिनी नदी दिखाई दे रही है और उसके उस पार मंदिर। नदी के ऊपर बने एक पुल से मैं मंदिर तक पहुंचती हूं।
जैसे ही बाहर जूते उतारने लगती हूं वहां लगे एक बोर्ड पर नजर पड़ती है। इस पर लिखा है- यहां फोटो खींचना और वीडियो बनाना सख्त मना है। इस तरह के बोर्ड तो देश के ज्यादातर धर्मस्थलों पर लगे हैं। इसके बावजूद भक्त वीडियो बना लेते हैं, फोटो खींच लेते हैं, लेकिन यहां ऐसा करना संभव नहीं। कदम-कदम पर सेवादार यहां आने वाले लोगों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
मंदिर में एंटर करते ही सबसे पहले श्री राम की मूर्ति है। आगे चलकर शिव की मूर्ति है। एक छोटा सा मां दुर्गा का भी मंदिर है। उसके बाद हनुमान जी का मंदिर आता है। इन सब के बाद वह स्थान आता है जहां नीम करौली बाबा बैठा करते थे, यानी वो आसन जमाया करते थे।
बाबा का कंबल, तख्त आंगन में रखा हुआ है। मैं पहला ऐसा मंदिर देख रही हूं जहां भगवा रंग नहीं है। कोई पूजा-पाठ नहीं है, कोई प्रसाद नहीं दिया जा रहा है। बाबा की हनुमान जी के साथ तस्वीरें है। मंदिर में कोई पुजारी तक नहीं है। मंदिर प्रशासन ही यहां की सारी व्यवस्था देखता है।
यह एक ऐसा अनोखा मंदिर है जहां पूजा विधि के तौर पर बस हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। यहां मैं देखती हूं कि जिसे जहां जगह मिल रही है वह वहीं बैठ मग्न होकर हनुमान चालीसा पढ़ रहा है। पूछने पर पता चलता है कि यहां हनुमान चालीसा ही पढ़ी जाती है और इसे ही प्रसाद के तौर पर चढ़ाया जाता है। प्रसाद से ज्यादा यहां सेवा का महत्व है।
मैंने कुछ लोगों को धाम के बाहर से कंबल खरीदकर चढ़ाते देखा, इसका कारण मैं जानना चाहती थी। मुझे बताया गया कि नीम करौली बाबा हर समय कंबल ओढ़कर रखा करते थे। कई दशक पहले इसी कंबल से जुड़ी एक घटना हुई, जिसके बाद से लोग कैंची धाम में कंबल चढ़ाने लगे।
मैं उस घटना को जानने के लिए उत्सुक हो जाती हूं।
पता चला कि इसका जिक्र नीम करौली बाबा के एक भक्त रिचर्ड एलपर्ट (रामदास) ने अपनी किताब 'मिरेकल ऑफ लव' में किया है।
किताब में रिचर्ड एलपर्ट ने लिखा है कि बाबा के भक्तों में फतेहगढ़ के एक बुजुर्ग दंपती भी शामिल थे। एक दिन बाबा अचानक इस बुजुर्ग पति-पत्नी के घर पर पहुंच गए। उनसे कहा कि रात में वे उनके घर पर रुकेंगे। दंपती बहुत खुश हुए। चूंकि वो गरीब थे, लिहाजा इस बात को लेकर थोड़े चिंतित भी थे कि बाबा के सत्कार में कोई कमी न रह जाए। किसी तरह उन लोगों ने बाबा के लिए खाने का इंतजाम किया। उन लोगों ने सोने के लिए बाबा को एक चारपाई और कंबल दिया।
बाबा की चारपाई के पास बुजुर्ग दंपती भी सो गए। पूरी रात बाबा नींद में कराह रहे थे। दंपती को ऐसा लगा कि बाबा को कोई मार रहा है। वो रात दंपती ने बड़ी मुश्किल से गुजारी। सुबह जब बाबा की नींद खुुली तो उन्होंने कंबल लपेट कर उनको दिया। साथ ही कहा कि इसे बिना खोले गंगा में बहा दो।
जब बुजुर्ग दंपती गंगा में कंबल बहाने जा रहे थे तब वो बहुत भारी होने लगा। बाबा के आदेश की वजह से दंपती ने उसे खोला नहीं। इस घटना के करीब एक महीने बाद इस दंपती का बेटा सकुशल घर लौट आया।
दरअसल, इस बुजुर्ग दंपती का एक ही बेटा था। वह ब्रिटिश फौज में सैनिक था। दूसरे विश्वयुद्ध के समय वह बर्मा में तैनात था। बेटे ने बताया कि करीब महीने भर पहले एक रात वह दुश्मन फौजों के बीच घिर गया था। पूरी रात गोलीबारी होती रही। इस युद्ध में उसके सारे साथी मारे गए। बेटा इस बात से आश्चर्यचकित था कि वो कैसे बच गया। ये वही रात थी जब बाबा नीम करौली उसके घर में सो रहे थे और पूरी रात कराह रहे थे।
कहानी जानने के बाद मैं कैंची धाम के हर कोने को निहारने लगती हूं। मैं यहां से पॉजिटिव वाइब्स अपने साथ लेकर जाना चाहती हूं। इस दौरान मेरे मन में यह सवाल आ रहा था कि जब यहां आम मंदिरों और धर्मस्थल जैसा कुछ होता ही नहीं है तो आखिर लोग यहां क्यों आते हैं?
इसका जवाब बदायूं से आए विवेक कुमार ने अपनी आस्था के आधार पर दिया। कहते हैं, ‘मेरा एक भाई कम उम्र का था। उसकी शादी भी नहीं हुई थी। एक दिन उसे हार्ट अटैक आ गया। पापा भी बिस्तर पकड़ चुके हैं। घर में सभी का जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। बाबा नीम करौली के इस आश्रम के बारे में बहुत सुना था। यहां आने से दिमाग को शांति मिली है।'
बाबा के भक्तों में युवाओं की अच्छी-खासी भीड़ है। शिखर वाजपेयी यहां मुझे मिलते हैं। वो मूल रूप से कानपुर से हैं। दिल्ली में लॉ फर्म चलाते हैं। वह बाबा के परम भक्त हैं। बताते हैं कि हमारे घर के मंदिर में बाबा की तस्वीर रखी है। अच्छी बात यह है कि यहां पूजा-पाठ की कोई विशेष विधि नहीं है। गुरु का दिया कोई मंत्र नहीं है और न ही कोई दीक्षा दी जाती है।
शिखर वाजपेयी से मैंने पूछा- कभी बाबा का कोई चमत्कार आपने देखा है? कहते हैं, ‘एक दफा मेरा उत्तराखंड की अदालत में एक केस लगा हुआ था। इस केस में देश का VVIP शामिल था। लोग मुझसे कह रहे थे कि तुम जीत नहीं पाओगे बड़े-बड़े लोग इसमें शामिल है। मैं उस केस को जीतने की मनोकामना लेकर बाबा के दरबार में गया। अंत में मैं केस जीत गया। यह केस मेरी प्रोफेशनल लाइफ के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। तब से मैं बाबा नीम करौली का भक्त हो गया हूं।
नीम करौली बाबा के भक्त वही लोग हैं जो हनुमान जी के भक्त हैं। यानी बजरंग बली के भक्त ही कैंची धाम पहुंचते हैं।
कुछ लोग बाबा नीम करौली को हनुमान जी का अवतार मानते हैं। कुछ लोग बाबा को हनुमान जी का भक्त। बाबा का कहना था कि जो व्यक्ति हर दिन हनुमान जी की पूजा करता है उसे सभी कष्टों से अपने आप ही मुक्ति मिल जाती है।
मंदिर की साफ-सफाई का तो जवाब ही नहीं है। एक महिला भक्त से मुलाकात होती है। उनका कहना है कि कैंची धाम की आभा ऐसी है कि लोग यहां आकर सुकून महसूस करते हैं। उनके अंदर अलग किस्म की ऊर्जा आती है।
मैं यह जरूर देख रही हूं कि स्थानीय लोगों को इससे अच्छा-खासा रोजगार मिला हुआ है।
बाबा के नाम पर होम स्टे, होटल जैसी तमाम चीजें हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कम से कम इस आश्रम की वजह से उन्हें रोजी-रोटी अच्छी मिली हुई है। बाबा नहीं होते तो यह जगह वीरान ही रह जाती।
नीम करौली बाबा के चमत्कार की कहानी जानने के बाद उनके निजी जीवन को जानने-समझने के लिए हमारा अगला पड़ाव भोपाल था। यहां नीम करौली बाबा के पोते डॉ. धनंजय शर्मा रहते हैं।
हमने जानना चाहा कि भक्तों को बाबा के गृहस्थ जीवन के बारे में ज्यादा नहीं पता, आप बता सकते हैं क्या?
डॉ. शर्मा कहते हैं- ‘ग्यारह साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। दादी तब हमारी दस साल की थीं। उन दिनों गौना अलग-अलग समय पर होता था। तीन साल में, पांच साल में, सात साल में। गौना जब हुआ तब उसके कुछ ही दिन के बाद दादा की मां की मौत हो गई थी, जिसके बाद महाराज (दादा) का जीवन ही बदल गया।
उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली, सौतेली मां से दादा की कभी बन नहीं पाई। उसने उन्हें बहुत दुख दिए। एक दिन उसने उन्हें बंद कर दिया, खाने को कुछ नहीं दिया। महाराज को बहुत गुस्सा आया और वह छत तोड़कर गांव से भाग गए। किसी को नहीं पता कि आखिर वह कहां गए।’
बाबा के गुरु कौन हैं? इस बारे में आपको पता है क्या? डॉ. शर्मा कहते हैं, ‘जब महाराज घर छोड़कर गए तब उनके साथ कौन था, कौन इनके गुरु थे, उनकी मुलाकात किससे हुई, इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता, लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि उन्होंने फर्रुखाबाद के पास नीम करौली गांव के पास गुफा में तपस्या की थी। वहां उनके हाथ की बनाई हुई हनुमान जी की मूर्ति आज भी है।
महाराज ने वहां 12-13 साल तक तपस्या की थी। वह केवल रात को निकला करते थे। जब वो 13-14 साल के थे तब उनके पिता को किसी ने सूचना दी कि आपके बेटे को फर्रुखाबाद के पास देखा गया है। उनके पिता वहां गए और उन्हें डांट लगाई कि किसी की बच्ची का जीवन क्यों खराब कर रहे हो। वहीं से महाराज का गृहस्थ जीवन शुरू होता है।’
आपको अपने दादा यानी बाबा के चमत्कार की कोई कहानी याद है क्या?
डॉ. शर्मा बताते हैं, ‘उनमें कई ऐसी बातें थीं जो उन्हें दूसरे संतों से अलग बनाती थीं। उनमें मरे हुए आदमी को जिंदा करने की शक्ति थी। देवराहा बाबा ने उनके बारे में लिखा भी है कि ऐसा सिर्फ नीम करौली बाबा ही कर सकते हैं। वह न तो मंत्र देते थे, न दक्षिणा लेते थे। छलावे में भी नहीं रखते थे। बस एक ही बात कहते थे कि हनुमान चालीसा पढ़ो, गरीबों को खाना खिलाओ। अगर कोई काम फिर भी नहीं बन रहा तो 108 बार हनुमान चालीसा पढ़ो।
कैसे पहुंचे सेलिब्रिटी बाबा नीम करौली तक
जूलिया रॉबर्ट्स: 2009 में जूलिया रॉबर्ट्स ने हिंदू धर्म अपनाया था। वो फिल्म ‘ईट, प्रे, लव’ की शूटिंग के लिए भारत आईं थीं। उन्होंने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया था कि वह नीम करौली बाबा की तस्वीर से प्रभावित हुई थीं। इसके बाद ही हिंदू धर्म को अपनाया।
स्टीव जॉब्स: स्टीव जॉब्स 1974 से 1976 के बीच भारत आध्यात्मिक खोज में आए थे। पहले वो हरिद्वार गए फिर कैंची धाम। वहां पहुंचने के बाद उन्हें पता लगा कि बाबा समाधि ले चुके हैं।
यह तक कहा जाता है कि स्टीव को एपल के LOGO का आइडिया नीम करौली बाबा के आश्रम से ही मिला था। बाबा को सेब पसंद था। यही वजह थी कि स्टीव ने अपनी कंपनी के LOGO के लिए कटे हुए एपल को चुना।
मार्क जुकरबर्ग: फेसबुक के फाउंडर मार्क जुकरबर्ग ने बताया था कि जब वो इस संशय में थे कि फेसबुक को बेचा जाए या नहीं, तब एपल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने उन्हें नीम करौली धाम जाने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग भारत आए और धाम गए। वहां मिली आध्यात्मिक शांति के बाद फेसबुक को नए मुकाम पर ले जाने की उन्हें ऊर्जा मिली।
Kumkum sharma 

