मन की शक्ति !

मनन से ही मन और बुद्धि में सुरति-स्मरण का उदय होता है।'

जैसे-जैसे तुम वार्तालाप में जाते हो, वैसे-वैसे स्मृति खो जाती है। तुमने कभी सोचा हो न सोचा हो, अब सोचना, निरीक्षण करना--तुम्हारी जिंदगी के अधिकतम उपद्रव तुम्हारे बोलने से पैदा होते हैं, नब्बे प्रतिशत, उससे भी ज्यादा। तुम अगर न बोलो तो नब्बे प्रतिशत उपद्रव तो तुम्हारे तत्क्षण गिर जाएं। तुम कुछ बोलते हो और उलझन में पड़ते हो।

क्या हो जाता है बोलने से? क्योंकि बोलने की अवस्था में सबसे कम स्मृति रहती है, सबसे कम सुरति--अवेयरनेस! क्योंकि बोलने में ध्यान दूसरे पर होता है; अपने पर ध्यान चूक जाता है। जब तुम बोलते हो, तब तुम दूसरे की तरफ जा रहे हो, तुम्हारा तीर दूसरे की तरफ जा रहा है। तो तीर का पिछला हिस्सा अपनी तरफ होता है, तीर का फल दूसरे की तरफ होता है। चेतना एक तीर है। वह दूसरे को देखती है। जिससे तुम बोल रहे हो, उस पर ध्यान होता है। अपने पर ध्यान चूक जाता है। और इसलिए उस गैर-भान की अवस्था में तुमसे बातें निकल जाती हैं, जिनके लिए तुम जन्मों तक पछताते हो।

तुम किसी स्त्री से कह बैठे कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। यह कभी सोच कर भी नहीं गए थे। यह पहले कभी खयाल में भी नहीं आया था। बात-बात में बात हो गयी। अब फंसे! अब इससे लौटना मुश्किल हो गया। अब इस बात से और बातें निकलेंगी। जैसे पत्तों में पत्ते लगते जाते हैं, वैसे बात में बात लगती जाती है। अब चल पड़े तुम एक यात्रा पर।

तुमने कभी खयाल नहीं किया है। खयाल करोगे तो साफ हो जाएगा कि जीवन की सारी झंझटों की कड़ियां शब्दों से शुरू होती हैं। और फिर एक शब्द जब बोल दिया तो फिर अहंकार जकड़ लेता है कि अब उसकी पूर्ति करनी भी जरूरी है।

तुम एक स्त्री को प्रेम करते हो। तुम उससे कहते हो, जन्मों-जन्मों तुझे प्रेम करूंगा। क्षण का तुम्हें भरोसा नहीं, कल का तुम विश्वास नहीं दिला सकते। कल सुबह क्या होगा, कोई जानता नहीं। लेकिन अभी तुम जन्मों-जन्मों के लिए बात कह रहे हो। अगर तुम जरा भी होश में हो तो तुम इतना ही कहोगे कि इस क्षण मुझे प्रेम मालूम पड़ता है, कल का क्या पता? लेकिन उससे अहंकार को रस न आएगा। क्योंकि जब तुम्हें प्रेम पता चलता है तो तुम सोचते हो, अब सदा प्रेम करूंगा। 'सदा' का तुम्हें पता है, क्या अर्थ होता है? हर स्थिति में तुम प्रेम कर सकोगे?

मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे पूछ रही थी कि अब तुम पहले जैसा मुझे प्रेम नहीं करते; मैं बूढ़ी हो गई हूं, इसीलिए? शरीर मेरा जर्जर हो गया है, इसीलिए? झुर्रियां पड़ गई हैं, इसीलिए? और याद है तुम्हें धर्मगुरु के सामने तुमने कहा था कि सुख-दुख में साथ देंगे!

मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, सुख-दुख में साथ देंगे; बुढ़ापे का किसने कहा था? तो सुख-दुख में तो साथ दे ही रहे हैं। बुढ़ापे की बात ही नहीं उठी थी।

तुम आज जब कह रहे हो तो तुम्हें पता है कि सदा का कितना अर्थ होता है? उसमें कितनी चीजें छिपी हैं? लेकिन आज तुम कह दोगे, कल फिर इस आश्वासन को पूरा करने में मुश्किल पड़ेगी। न पूरा कर पाओगे तो पछताओगे, पूरा करोगे तो दुखी होओगे। क्योंकि जब प्रेम हाथ से छूट जाएगा, नहीं बचेगा, तब तुम क्या करोगे? कैसे उसे जबर्दस्ती लाओगे? तब एक प्रवंचना का जाल शुरू होता है।

अगर व्यक्ति अपने शब्द का होश रख सके, जो कि कठिन है, शब्द के तल पर कठिन है; क्योंकि शब्द के तल पर तुम्हारी नजर दूसरे पर है, इसलिए अपना होश तुम कैसे रखोगे? सिर्फ बुद्धों के लिए बोलना ठीक है। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की साधना से दो फल वाला तीर पैदा कर लिया है। उनके पास ऐसी चेतना है--उसी चेतना का नाम सुरति है--जब तीर में दो फल हैं, दूसरे की तरफ, अपनी तरफ। जब चेतना दोनों तरफ एक साथ देख पाती है; जब चेतना तुममें बातचीत करने में खो नहीं जाती, सजग बनी रहती है; बोलने वाला बोलता रहता है, साक्षी भीतर खड़ा रहता है; तब एक भी शब्द तुम्हें किसी झंझट में न ले जाएगा। अन्यथा शब्द तुम्हें झंझट में ले जाएंगे।

एक सूफी कहानी है। गुरु ने चार शिष्यों को मौन के लिए भेजा। सांझ हो गयी। मस्जिद में चारों बैठे हैं। दीया नहीं जलाया किसी ने। नौकर पास से गुजरता था। तो एक ने कहा, ऐ भाई, रात हुई जा रही है, दीया जला दे। दूसरे ने कहा, तुम बोल गए और गुरु ने मना किया था! और तीसरे ने कहा, क्या कर रहे हो? तुम भी बोल गए! गुरु ने मना किया था। और चौथे ने कहा, हम ही ठीक; हम अभी तक नहीं बोले।

बोलने में एक विस्मरण है। यह कहानी तुम्हें हंसने जैसी लगती है, तुम्हारी ही कहानी है। तुम चुप बैठो, तब पता चलेगा कि बोलने का कितना मन होने लगता है। तुम चुप बैठो, तब पता चलेगा कि भीतर तुम किस तरह बोलने लगते हो। और बाहर कोई भी बहाना मिल जाए कि सुरति खो जाओगे।

कहानी का मतलब क्या है? कहानी का मतलब है, उन चारों में से किसी को स्मरण न रहा कि हम चुप होने के लिए यहां बैठे हैं। और कहानी का मतलब है कि जब नौकर निकला पास से, दूसरा आया, ध्यान दूसरे पर गया, सुरति चूक गयी।

नानक कहते हैं, मनन से ही मन और बुद्धि में सुरति उदय होती है।आता है। बुद्ध ने बड़ा जोर दिया स्मृति पर--राइट माइंडफुलनेस पर--कि तुम जो भी करो, स्मरणपूर्वक करना। बोलो तो स्मरणपूर्वक बोलना। चलो तो स्मरणपूर्वक चलना। आंख भी हिलाओ, पलक भी हिले--स्मरणपूर्वक। होश खो कर मत करना कुछ। क्योंकि जो तुम होश खो कर करोगे, वही पाप है। और जो तुम होश खो कर करोगे, उससे ही तुम अपने से दूर निकलते जाते हो। अपने पास आने की एक ही विधि है कि तुम ज्यादा से ज्यादा होश सम्हालना। कैसी भी परिस्थिति हो, तुम एक चीज मत खोना--सब खो जाने देना--वह है होश! घर में आग लगी हो तो भी तुम होशपूर्वक घर के बाहर निकलना।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने एक संस्मरण लिखा है कि उनको वाइसराय ने सम्मान के लिए बुलाया था। गरीब आदमी थे। पुराना बंगाली ढंग का कुरता, कमीज, धोती पहनते थे। फटे-पुराने कपड़े थे। मित्रों ने कहा कि वाइसराय की सभा में इन कपड़ों में जाना उचित नहीं, अच्छे कपड़े बना देते हैं। बात उनको भी जंची। एक-दो दफे इनकार भी किया। लेकिन फिर उनको भी लगा कि ठीक नहीं है, तो कपड़े बनवा लिए।

कल सुबह वाइसराय की सभा में जाने को हैं, उसके एक दिन पहले की घटना है। सांझ को लौटते थे बगीचे से टहल कर। सामने ही एक मुसलमान अपने कपड़े पहने हुए--चूड़ीदार पायजामा, शेरवानी, हाथ में छड़ी लिए--बड़े शौक से शाम की चहलकदमी करते हुए जा रहा है घर वापस। एक आदमी भागा हुआ आया और उसने कहा, मीर साहिब, आपके घर में आग लग गयी, जल्दी करिए। लेकिन वह वैसे ही चलता रहा, चाल में जरा भी फर्क न आया--जरा भी! जैसे नौकर आया ही नहीं, जैसे नौकर ने कुछ कहा ही नहीं; जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो; वह जैसा था, ठीक वैसा ही रहा। सुर जरा भी न बदला उसका। नौकर समझा कि शायद मालिक ने सुना नहीं; क्योंकि आग लगने का मामला है। उसने कहा कि आप समझे या नहीं? सुना आपने या नहीं? किस विचार में खोए हैं? मकान में आग लग गयी!

नौकर कंप रहा है, पसीना-पसीना है, बड़ा उत्तेजित है। और नौकर है! उसका कुछ भी नहीं जल रहा है। उस मुसलमान ने कहा, सुन लिया! लेकिन मकान में आग लग गयी, इस वजह से क्या जिंदगी भर की चाल बदल दें? आते हैं।

ईश्वरचंद्र पीछे ही थे। उन्होंने सुना तो बड़े हैरान हुए। तो उन्होंने भी सोचा कि जिंदगी भर के कपड़े बदलें वाइसराय के लिए! और यह एक आदमी है...वह वैसे ही...! पीछे गए उसके। देखें, यह आदमी अनूठा है। वह आदमी वैसे ही गया, जैसे वह रोज जाता था। वही चाल रही, वही छड़ी का हिलना रहा। घर पहुंच गया। आग लगी है। उसने नौकरों से कह दिया कि बुझाओ! और स्वयं बाहर खड़ा रहा। सब इंतजाम कर दिया, लेकिन उस आदमी में रत्ती भर भी फर्क नहीं है। ईश्वरचंद्र ने लिखा है कि मेरा हृदय श्रद्धा से झुक गया। ऐसा आदमी तो मैंने देखा नहीं।

यह किस चीज को सम्हाल रहा है? उसका नाम सुरति है; उसका नाम स्मृति है। यह एक बात को सम्हाले हुए है कि अपने होश को नहीं खोना है। जो हो रहा है, हो रहा है। जो किया जा सकता है, वह कर रहे हैं। जो करने योग्य है, वह किया जाएगा। लेकिन स्मृति कभी भी खोने योग्य नहीं है। इस दुनिया में ऐसी कोई भी चीज नहीं है इतनी मूल्यवान, जिसके लिए तुम सुरति को खोओ।

लेकिन तुम छोटी-छोटी चीजों में खो देते हो। एक रुपए का नोट गिर गया, और देखो तुम कैसे पगला जाते हो। एकदम ढूंढ़ रहे हैं पागल की तरह! जहां नहीं हो सकता, वहां भी ढूंढ़ रहे हो।

किसी आदमी को देखो! घर में उसकी कोई चीज खो गयी। चीज बड़ी हो, वह छोटा सा डिब्बा भी खोल कर देख रहा है कि शायद...। तुम स्मृति को खोने को तैयार ही हो। खोने को तैयार हो, यह कहना भी शायद ठीक नहीं। तुम्हारे पास है ही नहीं, तुम खोओगे क्या? तुम मूर्च्छित...।

नानक कहते हैं, 'मनन से मन और बुद्धि में सुरति का उदय होता है।'

जैसे-जैसे ओंकार गहरा बैठता है, पहले तुम्हारा उच्चार बंद होता है, वैसे ही तीर भीतर की तरफ मुड़ता है। क्योंकि अब बाहर कोई न रहा, जिससे बोलना है। बोलना यानी बाहर से संबंध बनाना। बोलना यानी सेतु। उससे हम दूसरे तक जाते हैं। वह संवाद है। वह दूसरे और हमारे बीच का नाता है। वह तोड़ लिया। नहीं बोलना। चुप हो गए।

चुप का अर्थ है, यात्रा उल्टी हो गयी। तीर वापस लौटा। अंतर्यात्रा शुरू हुई। उसी वक्त से स्मृति की पहली झलक आनी शुरू हो जाएगी। तुम पाओगे, तुम हो। तुम पहली दफा जाग कर पाओगे कि मैं हूं। अब तक सब दिखायी पड़ता था, तुम भर नहीं दिखायी पड़ते थे। तुम भर छाया में खड़े थे। दीया तले अंधेरा था। अब तुम जागोगे। फिर जैसे-जैसे गहराई बैठेगी ओंकार की, मनन शब्द पर आएगा, वैसे-वैसे सजगता बढ़ेगी--उसी अनुपात में।

तुम ऐसा समझो, जैसे तराजू के दो पलड़े हैं। एक पलड़ा ऊपर उठता है तो दूसरा उसी अनुपात में नीचे आता है। जिस अनुपात में तुम भीतर जाते हो, उसी अनुपात में सुरति बढ़ती है। और तीसरे तल पर जहां शब्द भी खो जाता है, सिर्फ ओंकार की ध्वनि रह जाती है, नाद रह जाता है--एक ओंकार सतनाम--वहां अचानक परिपूर्ण सुरति हो जाती है! तुम जाग कर खड़े होते हो, जैसे हजारों साल की नींद टूट गयी। अंधेरा गया, प्रकाश आया। जन्मों-जन्मों से तुम जैसे सोए थे और एक सपना देख रहे थे। सपना विच्छिन्न हो गया, सुबह हो गयी। भोर हुई। ब्रह्ममुहूर्त पहली दफा आया!

'मनन से ही सभी भुवनों की सुधि आती है। मनन से ही मुंह में मार नहीं खानी पड़ती। मनन से ही यम के साथ नहीं जाना पड़ता। वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता है, उसका मन ही जानता है।'