ज्वारे का रस
#जवारे
नवरात्री में जहाँ जहाँ भी घट स्थापना हुई, वहाँ गेंहू/जौ के जवारे बोये हुए जरूर मिल जावेंगे....इन्ही जवारों का नवरात्रि के बाद फिर नदी तालाबो में विसर्जन होता रहा है.....ओर इन्ही नदी तालाबो का पानी हम आज से कुछ वर्षों पहले तक हम पीते आये थे जो हमारे स्वास्थ्य के लिए #अमृत_जल से कम नही होता था .....वैसे गेहूँ हमारे आहार का प्रमुख घटक है.....इसका प्रमुख कारण यह है कि इसमें पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है.....।
#आयुर्वेद के अनुसार संसार का कोई ऐसा रोग नहीं जो गेहूँ/जौ के जवारे रस के सेवन से ठीक न हो सके.....कैंसर जैसे घातक रोग भी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में इसके प्रभाव से अच्छे होते पाये गये हैं..... कमजोरी, रक्ताल्पता, दमा, खाँसी, पीलिया, ज्वर , मधुमेह, वात व्याधि , बवासीर जैसे रोगों में भी जवारे का रस लाभकारी सिद्ध होता है..... फोड़े - फुंसियों एवं घावों पर इसकी पुलटिस बनाकर बाँधने से वह एण्टीसेप्टिक तथा एण्टी इन्फ्लैमेटरी औषधियों की तरह काम करता है......
पोषक तत्वों की अधिकता के कारण ही गेहूँ को खाद्यान्नों में सर्वोपरि माना गया है.....पर जवारों का रस इतना लाभकारी है ,कम ही लोग जानते हैं...।
वृद्धावस्था की कमजोरी दूर करने में गेहूँ के जवारे का रस किसी भी उत्तम टानिक से कम नहीं, वरन् अधिक ही उत्तम सिद्ध हुआ है..... यह एक ऐसा प्राकृतिक टानिक है जिसे हर आयुवर्ग के नर - नारी जब तक चाहें प्रयोग कर सकते हैं..... अंग्रेजी दवाओं - टानिकों का अधिक दिनों तक सेवन नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे लाभ के स्थान पर नुकसान ज्यादा पहुँचाते हैं.....परन्तु इस रस के साथ ऐसी कोई बात नहीं...... पोषकता, गुणवत्ता एवं हरे रंग के कारण गेहूँ के पौधे के रस को ‘#ग्रीन_ब्लड’ की संज्ञा दी गयी है......गेहूँ के ताजे जवारे के साथ यदि थोड़ी - सी हरी दूब - दूर्बाघास एवं 2 - 4 दाने कालीमिर्च को पीसकर रस निकाला और उसका सेवा किया जाए तो पुराने से पुराना #एलर्जिक_रोग भी जड़ - मूल से नष्ट हो जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होकर युवाओं जैसी स्फूर्ति आ जाती है.....।
#प्रयोग_विधि
गेहूँ के जवारे उगाने का सबसे सरल तरीका यह है कि छोटे - छोटे सात मिट्टी के गमले लिये जाएँ और उन्हें मिट्टी से भर दिया जाए। मिट्टी भुरभुरी और रासायनिक खाद से रहित होनी चाहिए..... अब इन गमलों में क्रम से पहले दिन एक गमले एक मट्टी गेहूँ बो दिया जाए तो दूसरे दिन दूसरे गमले में.....दिन में 1 - 2 बार सिंचाई कर दी जाए..... इस प्रकार गेहूँ अंकुरित होकर 6 - 7 दिन में जब जवारे थोड़े बड़े हो जाएँ तो आवश्यकतानुसार आधे गमले के कोमल जवारों को जड़ सहित उखाड़ लिया जाए.... जवारे 7 -8 इंच के रहें तभी उन्हें उखाड़ लेना चाहिए, अन्यथा ज्यादा दिनों तक पड़े रहने से उनसे वह लाभ कम मिलता है, जिसकी अपेक्षा की जाती है। जवारों का रस सुबह खाली पेट लेना अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। रस पीने के एक घंटे बाद ही कुछ और चीज खायी-पीयी जाए। जवारे छाया में ही उगाये जाए। उन्हें केवल आधा घंटे के लिए हलकी धूप में रखा जा सकता है......जवारों से रस निकालने का सरल तरीका यह है कि कोमल पौधे उखाड़ कर उनका जड़ वाला हिस्सा काटकर अलग कर दिया जाए ओर डंठल तथा पत्ते वाले हिस्से को पानी में दो - तीन बार अच्छी तरह धोकर साफ कर लिया जाए.... इसे सिल पर रखकर पानी के हलके छींटे मारते हुए बारीक लुग्दी की तरह पीस कर कपड़े से किसी बर्तन में छानकर सारा रस निकाल लिया जाए....इस रस को पीने से एक महीने के अंदर ही रक्त में रक्त - कणों की विशेषकर होमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाती है।
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