परवरिश:अभिभावकों से दूर रहकर युवा बच्चे गलत फैसले कर सकते हैं, हालात बिगड़ रहे हैं तो बच्चों को संभाल लीजिए
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मिलते ही उसने मुझे कसकर गले लगा लिया। उसकी भी आंखें नम थीं, मैं भी भावुक हो गई। अमृता, मेरी बचपन की सहेली है। दोनों पति-पत्नी नामी डॉक्टर हैं। कहने को तो उनके जीवन में सब कुछ है, वह जिसकी हसरत हर किसी को होती है। दोनों बच्चे भी पढ़ाई में अच्छे निकले। पर वही ‘मुकम्मल जहां’ वाली बात। अमृता के हंसते-मुस्कराते चेहरे के पीछे बहुत गहरी पीड़ा छुपी है। एक ऐसा कष्ट जिसका ज़िक्र ना वो करती है ना उसके पति डॉ मुकुंद।
उनकी बेटी पलक जब छोटी थी, तब से ही अमृता का कहना नहीं मानती थी। जब भी मुलाकात होती अमृता अक्सर मुझसे शिकायत किया करती। ‘तुम मनोवैज्ञानिक, बच्चों के ज़िद्दीपन का इलाज कब निकालोगे?’ चूंकि वह ख़ुद इतनी जानी-मानी डॉक्टर थी, उसको सलाह देना बहुत मुश्किल था। फिर भी मैं कह दिया करती थी कि तुम अस्पताल से बच्चों के लिए समय निकालो। उनके साथ रिश्ता बनाओ। उनसे बात किया करो। उसके पास एक ही जवाब होता था, ‘हम जितना करते हैं इनके लिए कौन करता होगा?’ डॉक्टर मुकुंद सर्जन थे। अपनी अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद वे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर पूरा ध्यान देते थे। पलक चंचल थी। होशियार थी पर उसकी रुचि गाने और नाटक में ज़्यादा थी। अक्सर पढ़ाई को लेकर मुकुंद उस पर नाराज हो जाते थे।www.jaimamart.com
पर वह नहीं आई। मुकुंद ग़ुस्से और अहंकार में बिल्कुल चुप हो चुके थे, पलक का नाम भी नहीं लेते, उसके बारे में पता करना तो दूर। पर अमृता को उसकी सहेलियों से पता चला वह आनंद के साथ पीजी शेयर करके रहने लगी है। उन दोनों में भी अनबन होती रहती है पर वह कहती है, ‘मर जाऊंगी पर घर नहीं जाऊंगी।’ बहुत बार अमृता का मन करता कि पलक से जाकर मिलूं उसे समझा-बुझाकर घर ले आऊं पर उन दोनों के बीच कभी ना भर सकने वाली खाई बन चुकी थी।
अभिभावक, आज के दौर में बहुत ही कठिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बच्चों की परवरिश के पारंपरिक तरीक़े, प्यार से समझाना, ज़रूरत पड़ने पर डांट देना, प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है। ऐसे में इस विषय पर मनोवैज्ञानिक शोध और सिद्धांत उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। वैसे तो पीढ़ियों के बीच मत-मतांतर पहले भी होते थे पर उस समय स्नेह, आदर और मर्यादा के रहते मां-बाप और बच्चों के रिश्तों के बीच इतनी खटास नहीं आती थी और सभी समय रहते अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर लेते थे। परंतु सोशल मीडिया के इस दौर में जहां बच्चों की एक पूरी अलग दुनिया जिसे हम आभासी यानी वर्चुअल वर्ल्ड कहते हैं, बन चुकी है, वहां अभिभावकों के लिए नए सिरे से बच्चों के साथ रिश्तों को परिभाषित करना ज़रूरी हो गया है।
सबसे पहले तो यह सोचें कि अब बच्चों के लिए साधन उपलब्ध कराने भर से कोई भी माता-पिता उनके जीवन में योगदान नहीं कर पाएंगे।
इस पीढ़ी के बच्चों को ज़रूरत है आपके साथ की, आपके समय की, आपके निष्पक्ष मार्गदर्शन की। आपको अपने बच्चों के साथ रिश्ता मज़बूत बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना होगा। उनसे मिलने के लिए उनकी दुनिया में क़दम रखना होगा।
बिना किसी पूर्वग्रह के उनकी बातों को, उनके अपने मत को सुनना और समझना होगा।www.tourfacility.com
बच्चों के लिए क़दम-क़दम पर उनका ध्यान बंटाने के हज़ारों साधन उपलब्ध हैं। वे पूरी तरह से भ्रम की स्थिति से गुज़र रहे हैं जहां हर मोड़ पर सही दिशा का चुनाव करना होता है और सारी दिशाएं धुंधली नज़र आती हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों के मां-बाप के साथ कितने मज़बूत, सुरक्षित और गहरे संबंध हैं, इस पर उनके आगे के जीवन के सारे रिश्ते निर्भर करते हैं।
अगर मां-बाप के साथ ही उनके मन में असुरक्षा की भावना रही तो आगे आने वाले सारे संबंधों में असुरक्षित ही महसूस करेंगे और किसी पर भी जल्दी से, बिना जांचे-परखे विश्वास कर लेंगे या फिर किसी पर भी विश्वास कर ही नहीं पाएंगे। ऐसे में वे जीवन से और लोगों से असंतुष्ट और नाख़ुश बने रहेंगे।
अभिभावक बच्चों के साथ मनोविज्ञान के सुझाए गए सरल सिद्धांतों पर अमल करके बहुत मधुर और भावनात्मक रूप से स्थिर संबंध विकसित कर सकते हैं।
इसका पहला सिद्धांत है उपलब्धता
बच्चों की विकासशील अवस्था में क़दम-क़दम पर उन्हें आपकी ज़रूरत होती है। उस समय आपके उपलब्ध कराए हुए साधन आपकी कमी पूरी नहीं कर पाएंगे। आपका उनके लिए मौजूद होना, उनकी बात सुनने के लिए तत्पर रहना, उनके लिए अमूल्य है।
दूसरा सिद्धांत है संवेदनशीलता
बच्चों के कोमल मन को पढ़ पाना, उसे समझ पाना, बिना प्रतिक्रिया दिए, उनके मन की बात को पूरी संवेदना के साथ सुन पाना, एक अभिभावक के लिए बच्चों के मन में सदा के लिए घर बना सकता है। अगर आप से संवेदना नहीं मिली तो वे किसी और से भी इसकी उम्मीद नहीं कर पाएंगे।
तीसरा सिद्धांत है उनके जीवन में रुचि लेना
बच्चों के जीवन में क्या हो रहा है? उनके मोबाइल गेम, उनके कार्टून, उनके सोशल मीडिया एप्स, उनके ‘रियल’ और ‘वर्चुअल’ दोस्त, उनके पसंदीदा म्यूज़िकल बैंड, उनकी पसंदीदा वेब सीरीज़, उनकी पसंदीदा स्पोर्ट्स और खिलाड़ी, इनकी जानकारी रखना, इनके बारे में और जानने की उत्सुकता दिखाना, उनकी दुनिया में जाकर उनके साथ समय बिताना और उससे परिचित होना, उन्हें निश्चित रूप से आपके क़रीब लाएगा।
चौथा सिद्धांत है प्रवचन नहीं संवाद
‘तुम्हें ऐसा करना चाहिए’, ‘ऐसा नहीं करना चाहिए’ इस तरह के निर्देशों से बच्चे बहुत जल्दी उकता जाते हैं। बढ़ते बच्चों के साथ ऐसा संवाद स्थापित कीजिए जहां आप उन्हें अपने समानांतर रखकर उनके मत का भी सम्मान कर पाएं। ऐसा करने से बच्चे अपनी बात आपसे खुलकर रख पाएंगे। उनके साथ आप स्वयं को भी और अपनी सोच को विकसित होने दें।
अपने बच्चों से ख़राब हुए संबंधों को भी इन सिद्धांतों पर काम करके सुधारा जा सकता है। याद रखिए आपसे भी त्रुटियां हो सकती हैं। अपने अहंकार को बच्चों से ज़्यादा कभी बड़ा ना होने दें। जहां ग़लती हो उसे मानें, जहां हो सके वहां उन्हें भी क्षमा करें। बिना किसी शर्त के निश्चल स्नेह से बच्चों के मन को फिर से जीतने का ईमानदारी से प्रयास करें। बच्चे आपमें किसी निगरानी रखने वाले ‘नैतिक जासूस’ को देखकर हताश महसूस करते हैं। उनसे ऐसा संबंध विकसित करें कि आप उनकी सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताओं को उनसे खुलकर कह सकंे और साथ ही हर परिस्थिति में उनका साथ देने का आश्वासन भी दे सकें। बच्चों को आपकी और आपके प्यार की ज़रूरत है। एक क़दम आगे बढ़ाएं, उन्हें अपने क़रीब आने का मौक़ा दें। जिनसे दूरियां बन चुकी हैं उन्हें अपने मन में, अपने घर में लौटा लाएं।
Naresh Chouhan 

