टेलीकॉम कंपनियों के बेस्ट सर्विसेज के दावे फेल: कोरोना काल में रिश्तेदारों का हाल पूछने टीलों पर जाना पड़ता है, क्योंकि वहीं आते हैं सिग्नल
अगर दिन में घंटे-दो-घंटे भी मोबाइल में सर्वर नहीं आता है तो हम परेशान हो जाते हैं। रिश्तेदार, परिचितों के अलावा ऑफिस के कामकाज से भी कट जाते हैं। लेकिन, कोरोना महामारी के दौर में चंबल नदी के तटीय इलाकों में टेलीकॉम कंपनियों के बेस्ट सर्विसेज के दावे फेल हो रहे हैं। यहां न कॉल लगती है और न ही इंटरनेट आता है।
सिग्नल के लिए भी ऊंचे टीले (टापुओं) पर जाना पड़ता है। हेल्पलाइन का नंबर लगाओ तो मध्य प्रदेश में जाकर कनेक्ट हो जाता है। अगर, रात में कोई इमरजेंसी हो जाए तो सुबह का इंतजार करना पड़ा है। सरमथुरा क्षेत्र की झिरी और मदनपुर पंचायत के 15 गांवों के लोग लंबे समय से इस समस्या से परेशान हैं। दूसरी ओर, डकैत और बदमाश इस स्थिति का फायदा उठाते हुए वे इन इलाकों में आ छिपते हैं। क्योंकि यहां से पुलिस को उनकी लोकेशन नहीं मिल पाती। इसलिए न तो नंबर ट्रेस होते हैं और न ही कॉल रिकॉर्डिंग हो पाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कोरोना संक्रमण को लेकर रिश्तेदारों या अन्य का हालचाल लेने के लिए उन्हें मोबाइल नेटवर्क के लिए उन्हें रोजाना मिट्टी के ऊंचे टापुओं पर जाना पड़ता है। जब वे टापुओं से नीचे आते हैं तो इंटरनेट के साथ मोबाइल टावर से कनेक्टिविटी टूट जाती है। इतना ही नहीं, रात के समय अगर कोई इमरजेंसी हो जाए तो सुबह तक इंतजार करना पड़ता है।
झिरी, शंकरपुर, दुर्गसी, भंमपुरा, कारीतीर समेत अनेक गांवों और ढाणियों में रहने वाले हजारों लोग मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलने से परेशान हैं। ग्राम पंचायतों में इंटरनेट नहीं चलने से ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का ऑनलाइन लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। झिरी सरपंच प्रतिनिधि संजू सिंह जादौन ने बताया कि एक प्राइवेट कंपनी ने झिरी और भंमपुरा में टावर लगाए थे। लेकिन, इनकी प्रॉपर सार-संभाल नहीं होने से राजस्थान सीमा में मोबाइल नेटवर्क बड़ी समस्या बना हुआ है।
Satveer Choudhary 

