पलाश के चमत्कारी गुण !

पलाश वृक्ष अथवा 'पलास', 'परसा', 'ढाक', 'टेसू' भारत के सुंदर फूलों वाले प्रमुख वृक्षों में से एक है। प्राचीन काल से ही इस वृक्ष के फूलों से 'होली' के रंग तैयार किये जाते रहे हैं। ऋग्वेद में 'सोम', 'अश्वत्‍थ' तथा 'पलाश' वृक्षों की विशेष महिमा वर्णित है। कहा जाता है कि पलाश के वृक्ष में सृष्टि के प्रमुख देवता- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। अत: पलाश का उपयोग ग्रहों की शांति हेतु भी किया जाता है।

पलाश के चमत्कारी गुण !
पलाश के चमत्कारी गुण !

परिचय

पलाश के चमत्कारी गुण ढाक का पेड़ पूरे भारत में पैदा होता है। इसके पेड़ की ऊंचाई 40 से 50 फुट तथा टहनियों की चौड़ाई 5 से 6 फुट होती है। इसकी टहनिया टेढ़ी-मेढ़ी और छाल हल्के भूरे रंग की होती है, इनके पत्ते 5 से 8 इंच लम्बे और 4 से 6 इंच चौड़े होते हैं। इनके फूल चमकीले नारंगी लाल के होते हैं। फलियां 4 से 6 इंच लम्बी, डेढ़ से 2 इंच चौड़ी, चपटी होती हैं। बीज चपटे, गोलाकार और फली के अग्र (आगे वाले) भाग में एक ही लगता है। इनके फूलों को पानी में उबालकर रंग बनाया जाता है। इसके पत्ते से दोने तथा पत्तलें बनाई जाती हैं। गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार : ढाक रस में कडुवा, तीखा, कषैला, गुण में छोटा, रूक्ष, गर्म प्रकृति का होता है। इसका फूल-शीतल तथा कफ, वात शामक होता है। यह बवासीर, अतिसार (दस्त), रक्त विकार, मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन), मधुमेह, नपुंसकता, गर्भ की रक्षा, पीड़ा को दूर करने वाला, फोड़े-फुंसी और सूजन में गुणकारी और लाभकारी है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार ढाक का बीज और गोंद तीसरे दर्जे की गर्म और खुश्क होती है, नपुंसकता में इसके बीज और तेल काफी लाभदायक है। इसके पत्ते भूख बढ़ाते हैं तथा पेट के कीड़ों को नष्ट करते हैं। इसकी जड़ का काढ़ा कामशक्तिवर्द्धक, शीघ्रपतन दूर करने वाला और प्रमेह नाशक होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार : इसका विश्लेषण करने पर प्राप्त होता है कि इसके स्थिर 18 प्रतिशत होता है। छाल और गोंद में काइनोटैनिक एसिड और गैलिक एसिड 50प्रतिशत व क्षार 2 प्रतिशत मिलता है। इसके फूल कामोत्तेजक, संकोचक, गर्भवती के रक्तातिसार दूर करने वाले, मासिक-धर्म को साफ व ठीक समय में लाने वाला तथा सूजन को दूर करने वाले होते हैं। ढाक के फूल : यह रुधिर विकार, मूत्रकच्छ (पेशाब में जलन), प्यास, जलन, कुष्ठनाशक आदि गुणों से युक्त है। विभिन्न भाषाओं में नाम : हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में सरिस्का अलवर में इसे छिल्ला कहा जाता है हिन्दी ढाक, टेसू, पलाश

संस्कृत पलाश, किंशुक मराठी पलस

अंग्रेजी डानी ब्रांच ब्यूटिया

रंग : इनके पत्ते हरे, फूल लाल, पीले व कली काली होती है।

स्वाद : इसका स्वाद फीका, तीखा और कषैला होता है। स्वरूप : ढाक के पेड़ बड़े-बड़े होते हैं, जो अक्सर नदी के किनारे और वनों में पाये जाते हैं , इसके पत्ते गोल और एक डण्डी में 3-3 होते हैं, पहला लाल निकलता है, फिर हरे हो जाते हैं और फूल की डण्डी काली और रंग अत्यन्त

सुन्दर होता है। फल लम्बी और गुच्छेदार होती है। बीज गोल व चपटी होती है। स्वभाव : इसकी प्रकृति गर्म होती है।

हानिकारक : इसका अधिक मात्रा में उपयोग गर्म स्वभाव वालों के लिए हानिकारक होता है।

गुण : ढाक जलन को कम करता है, वीर्य को बढ़ाता है, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ता है और बवासीर के लिए लाभकारी होता है। इसके फूल कफ, तथा सूजाक नाशक है, यह मल को रोकता है। सफेद फूलवाला ढाक अत्यन्त लाभकारी होता है। इसके कोमल-कोमल पत्ते पेट के कीड़े और वात को नष्ट करता है।

मात्रा : ढाक की छाल का चूर्ण 2-3 ग्राम, छाल का काढ़ा 50 से 100 मिलीलीटर, एक बीज का चूर्ण 1 से 3 ग्राम । फूल चूर्ण 3 से 6 ग्राम । गोंद 1 से 3 ग्राम ।

विभिन्न रोगों में प्रयोग 

 1. दाद :

• ढाक के बीजों को नींबू के रस में पीसकर बने लेप को 2-3 बार रोजाना लगाने

से दाद ठीक हो जाता है।

• ढाक (पलास) के बीज और कत्था बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर दाद पर लगाने से दाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

 2. बिच्छू दंश : ढाक के दूध में बीज को पीसकर दंश पर 2-3 बार लगाने से लाभ मिलता है।

 3. दांत का दर्द : ढाक के पत्ते पर खाने का चूना लगाकर और चुटकी भर

नौसादर लपेटकर दांतों के बीच दबाकर रखने से दर्द खत्म हो जाता है।

4. वरण, घाव :

• घाव होने पर ढाक के सूखे पत्ते की राख को घी में मिलाकर लगाते रहने से घाव भर जाते हैं।

• बराबर मात्रा में मिलाकर पीस लें, फिर इसे तिल के तेल में मिलाकर इसमें शहद मिलाकर रोजाना सोते समय योनि में नियमित रूप से लगाएं या ढाक की कलियों का सूखा चूर्ण और मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम

 5. कमजोरी : 20 ग्राम ढाक के बीजों का चूर्ण, 60 ग्राम काले तिल और 120 ग्राम मिश्री मिलाकर पीस लें। फिर 1 चम्मच सुबह-शाम 1 कप दूध के साथ सेवन करने से शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है। पीने से कुछ ही दिनों में योनि शैथिल्यता दूर हो जाती है।

6. प्रदर : ढाक के फूल के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर एक चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग नष्ट हो जाता है।

7. सिर दर्द : ढाक के बीजों को पानी में पीसकर बने लेप को सिर पर लगाने से 

8. मिर्गी का दौरा :

• ढाक के बीज का तेल सुंघाने और जड़ को पानी में घिसकर 2-4 बूंद नाक में डालने से मिर्गी के दौरे में रोगी को तुंरत लाभ मिलता है। • मिर्गी का दौरा आते समय ढाक की जड़ को घिसकर रोगी की नाक में टपकाने

से रोगी को आराम मिलता है

9. शीघ्रपतन : ढाक के कोमल पत्तों का चूर्ण गुड़ में मिलाकर गोलियां बनाकर दिन में 3 बार 1-1 गोली सेवन करने से शीघ्रपतन का रोग दूर हो जाता है। 

10. बालों के रोग : ढाक के पत्ते और छाल को जलाकर छान लें और इसमें हड़ताल पीसकर मिला दें। इसके बाद बालों को साफ करके इसका प्रयोग करें, इससे बालों के रोगों में फायदा होता है।

11. खून की उल्टी : ढाक के ताजे रस में मिश्री मिलाकर पीने से खून की उल्टी होना बंद हो जाती हैं। 

12. दस्त :

• ढाक की गोंद को लगभग आधा ग्राम से लेकर लगभग 1 ग्राम की मात्रा में पीने से दस्तों में आराम मिलता है। • ढाक के गोंद का चूर्ण बना लें। इसे लगभग 2 ग्राम की मात्रा में थोड़ी-सी दालचीनी के साथ लेने से अतिसार यानी दस्त में आराम मिलता है