परवेज मुशर्रफ की कहानी बताएंगे कि कैसे दिल्ली में बचपन गुजारने वाला एक लड़का पाकिस्तान के सबसे बड़े पद पर पहुंचा?
साल 2001 की बात है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति और पूर्व सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ भारत दौर पर आए थे। इस दौरान वह दिल्ली के दरियागंज स्थित नहरवाली हवेली जा पहुंचे। यहां पर 20 मिनट रुके और कई बार भावुक हुए। दरअसल, यह हवेली मुशर्रफ का पुश्तैनी घर था। आजादी के बाद मुशर्रफ का परिवार पाकिस्तान चला गया था।
मुशर्रफ का रविवार को दुबई में निधन हो गया। वे 79 साल के थे और पिछले तीन हफ्तों से एमाइलॉयडोसिस बीमारी की वजह से दुबई के अस्पताल में भर्ती थे। दिल्ली के दरियागंज में बचपन गुजारने वाले मुशर्रफ का पाकिस्तान जाकर ताकतवर तानाशाह बनना और फिर अपने ही देश से भागकर दुबई में शरण लेना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।
दिल्ली में जन्म हुआ, दादा टैक्स कलेक्टर थे
परवेज मुशर्रफ का जन्म 11 अगस्त 1943 को दिल्ली के दरियागंज इलाके में काफी संपन्न परिवार में हुआ था। इसे दिल्ली का पुराना हिस्सा कहा जाता है। दादा टैक्स कलेक्टर थे। पिता भी ब्रिटिश हुकूमत में बड़े अफसर थे। मां अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाती थीं। मुशर्रफ परिवार के पास पुरानी दिल्ली में एक बड़ी कोठी थी। अपने जन्म के चार साल बाद तक मुशर्रफ ज्यादातर यहीं रहे।
2005 में अपनी भारत यात्रा के दौरान परवेज मुशर्रफ की मां बेगम जरीन मुशर्रफ लखनऊ, दिल्ली और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गई थीं। जरीन 1940 में यहां पढ़ा करती थीं।
बंटवारे के बाद पाकिस्तान के कराची में बस गया परिवार
1947 में बंटवारे के बाद मुशर्रफ का परिवार कराची चला गया। उस समय मुशर्रफ सिर्फ 4 साल के थे। अंग्रेजों के लिए काम करने वाले मुशर्रफ के पिता पाकिस्तान की नई सरकार के विदेश मंत्रालय में अफसर बन गए। उनका तबादला कुछ समय के लिए तुर्की में भी हुआ। 1957 में पूरा परिवार फिर से पाकिस्तान लौट आया। इस तरह उनका परिवार नए मुल्क पाकिस्तान में भी अपना रसूख बनाने में सफल रहा।
21 साल की उम्र में सेना से जुड़े, 1965 की लड़ाई में बहादुरी के लिए मेडल मिला
मुशर्रफ की कॉलेज की पढ़ाई लाहौर के फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में हुई। वो कॉलेज में शानदार खिलाड़ी थे। उन्होंने ब्रिटेन में रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज से भी पढ़ाई की। साल 1961 में 18 साल की उम्र में पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी जॉइन की। 3 साल बाद 21 साल की उम्र में परवेज मुशर्रफ ने बतौर जूनियर अफसर पाकिस्तानी आर्मी जॉइन कर ली।
वह साल 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान सेकेंड लेफ्टिनेंट थे। ये युद्ध पाकिस्तान हार गया था। बावजूद इसके बहादुरी से लड़ने के लिए पाक सरकार की ओर से मुशर्रफ को मेडल दिया गया था।
नवाज शरीफ ने सेना प्रमुख बनाया, उन्हीं का तख्तापलट दिया
1997 में पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में जीत के बाद नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने। नवाज ने सत्ता हाथ में आते ही प्रशासन से लेकर सेना तक में अपनी पसंद के अधिकारियों को जगह दी। साल 1998 में जनरल परवेश मुशर्रफ को पाकिस्तान का चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया गया।
सेना की कमान हाथ में आते ही मुशर्रफ ने नवाज को बताए बिना कारगिल युद्ध की योजना बनाई। इससे नाराज होकर नवाज ने पाकिस्तान को कारगिल में मिली हार का जिम्मेदार मुशर्रफ को ठहराया। उन्होंने कहा कि मुशर्रफ के हाथ में आर्मी की कमान को सौंपना उनकी सबसे बड़ी गलती थी।
मुशर्रफ और शरीफ के बीच तनातनी कम होने के बजाय बढ़ती रही। 11 अक्टूबर को मुशर्रफ को इस बात की जानकारी मिली कि जल्द ही उन्हें पद से हटाया जा सकता है। इसके बाद 12 अक्टूबर 1999 को मुशर्रफ श्रीलंका दौरे के लिए रवाना हुए।
दूसरी ओर, नवाज ने इंटेलिजेंस चीफ जनरल जियाउद्दीन के साथ मिलकर इस्लामाबाद में मुशर्रफ को हटाने के लिए गोपनीय बैठक की। मुशर्रफ को जैसे ही इसकी भनक लगी तो उन्होंने अपने भरोसेमंद अधिकारियों जनरल अजीज खान, जनरल एहसान उल हक और जनरल महमूद को तख्तापलट करने का आदेश दिया।
इसके बाद नवाज शरीफ को मुशर्रफ के विमान का अपहरण करने और आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाने के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें परिवार के 40 सदस्यों के साथ सऊदी अरब भेज दिया गया।
अपनी जीवनी 'इन द लाइन ऑफ फायर - अ मेमॉयर' में जनरल मुशर्रफ ने लिखा कि उन्होंने कारगिल पर कब्जा करने की कसम खाई थी, लेकिन नवाज शरीफ की वजह से वो ऐसा नहीं कर पाए।
Naresh Chouhan 

