बच्चों को अगर दे रहे हैं मोबाइल तो पहले जान लें कि वो इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं भी या नहीं
- आजकल छोटे-छोटे बच्चों का मोबाइल चलाना आम हो गया है। बच्चों की ज़िद को देखते हुए माता-पिता उन्हें मोबाइल दे भी देते हैं। बच्चे तो ज़िद करेंगे ही, लेकिन वे इस बड़ी ज़िम्मेदारी के लिए तैयार हैं या नहीं, यह जानना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है...
अभिभावक बच्चों को उनके छुटपन से ही मोबाइल पकड़ा रहे हैं। और जिन बच्चों के पास नहीं है वो सवाल करते हैं कि उन्हें मोबाइल कब मिलेगा। सामान्य तौर पर 15 साल के बाद की उम्र मोबाइल के सीमित इस्तेमाल के लिए सही मानी जाती है। लेकिन बच्चों के लिए ज़रूरी मानकर या फिर उनके ज़िद करने पर अभिभावक 6-7 साल की उम्र में उन्हें मोबाइल पकड़ा रहे हैं, जो धीरे-धीरे आदत बन रही है। कोरोना संक्रमण के दौर में ऑनलाइन पढ़ाई के चलते बच्चों में मोबाइल का उपयोग भी बढ़ा, जो ऑफलाइन होने के बाद लत में बदल रहा है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की रिपोर्ट बताती है कि 59.2 फ़ीसदी बच्चे मैसेज भेजने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। इनमें से केवल 10.1 फ़ीसदी बच्चे ही शैक्षिक काम के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। 30.2 फ़ीसदी बच्चों के पास अपना स्मार्टफोन है। 8 से 18 आयु वर्ग के 20 फ़ीसदी बच्चे सोने से पहले बिस्तर में स्मार्ट फोन का उपयोग करते हैं। 10 साल के 37.8 फ़ीसदी बच्चों का फेसबुक और 24.3 फ़ीसदी बच्चों का इंस्टाग्राम अकाउंट है।
परंतु, बच्चों को मोबाइल देना है या नहीं, इसका फ़ैसला सिर्फ़ उम्र के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनकी समझदारी, ज़रूरत और जानकारी को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।
इसलिए पहले ख़ुद से ये तीन सवाल पूछें...
क्या बच्चे को मोबाइल की ज़रूरत है?
अगर बच्चा सिर्फ़ स्कूल में रहकर पढ़ाई करता है, उसे स्कूल भी आप ही छोड़ते और लेकर आते हैं तो उसे मोबाइल की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अगर वो अन्य गतिविधियों (एक्स्ट्रा करिक्यूलर एक्टिविटी) में शामिल होने के लिए स्कूल में रुकता है तो उसे सिर्फ़ उतने समय के लिए मोबाइल दे सकते हैं। अगर बच्चा मैसेज करने के लिए बहुत छोटा है तो इसका भी ध्यान रखें।
क्या बच्चा वाक़ई ज़िम्मेदार है?
बच्चा सामान के प्रति कितना जि़म्मेदार है, यह भी निर्णय का एक अहम आधार है। इससे जुड़े कुछ ज़रूरी सवाल, जैसे कि क्या वह मोबाइल संभाल सकता है, उसे सही जगह रख सकता है, उसकी कितनी क़द्र है या आपको इस बात का डर रहता है कि कहीं वो इसे गिराएगा या खोएगा तो नहीं? क्या स्कूल के नियमों के अनुसार वह जानता है कि उसे मोबाइल कब और कहां इस्तेमाल नहीं करना है? अगर वह इन ज़िम्मेदारियों और नियमों को समझता और पालन करता है तो वह मोबाइल के लिए तैयार है। बच्चे को मोबाइल देने से पहले इन सबके बारे में उससे बात करें।
क्या वह सुरक्षा के प्रति जागरूक है?
अगर बच्चे को कॉल के साथ-साथ इंटरनेट की आवश्यकता है तो सुनिश्चित करें कि वह इससे जुड़ी सुरक्षा के बारे में जानता हो। कहीं वह इंटरनेट पर कुछ अनुचित तो नहीं खोजेगा, सोशल मीडिया का इस्तेमाल तो नहीं करेगा, अगर किसी लिंक पर क्लिक कर दिया और मोबाइल में वायरस आ गया तो? या क्या वह मोबाइल और इंटरनेट सुरक्षा के साथ इस्तेमाल करना जानता है?
अगर बच्चा इतना समझदार है तो उसे मोबाइल देने के बारे में सोच सकते हैं, लेकिन...
कुछ सीमाएं भी तय करें
- बच्चा घर में मोबाइल कितनी देर तक इस्तेमाल कर सकता है और कौन-कौन से फीचर उपयोग कर सकता है, इसके नियम बनाएं। सोशल मीडिया और वीडियो गेम पर प्रतिबंध लगाकर रखें।
- रात के वक़्त फोन को बेडरूम में न रखें। बच्चों के साथ-साथ स्वयं अभिभावक भी इसका पालन करें।
- बच्चों के लिए नियम बनाएं कि कोई भी अपने डिवाइस की स्क्रीन को लॉक नहीं रखेगा।
- उन्हें सायबर सुरक्षा से संबंधित जानकारी दें, जैसे कि फर्जी नंबर से कॉल की पहचान समझें, किसी व्यक्ति की तस्वीर उसकी अनुमति के बिना नहीं लेना है, कोई सायबर बुलिंग कर रहा है तो अभिभावक को बताएं या कोई भी फाइल डाउनलोड करने से पहले पूछें आदि। फोन पर बातें और मैसेज करने की समय सीमा तय करें।
ज़रूरत को लत न बनने दें
- मोबाइल में मैसेज, कॉल, वीडियो गेम, सोशल मीडिया या वीडियो देखने की लत न लगे, इसके लिए मोबाइल में प्लेस्टोर या ऐपस्टोर में किड्स लॉक लगा सकते हैं। इससे वो अतिरिक्त एप्स डाउनलोड नहीं कर पाएंगे।
- परिवार के साथ घर से बाहर जाते वक़्त बच्चे मोबाइल घर पर ही छोड़कर जाएंगे।
- अगर बच्चे दिन में घर में अकेले रहते हैं और उनके संपर्क में रहने के लिए मोबाइल दे रहे हैं तो स्मार्ट फोन के बजाय कीपैड मोबाइल दें।
- बच्चे को मोबाइल नहीं देना चाहते हैं तो उसके लिए किड वॉच अच्छा विकल्प है। इसे ख़ास बच्चों के लिए बनाया गया है जिसमें सिम लगती है। ये मोबाइल की तरह काम करती है। इंटरनेट, एसओएस, मैथ गेम्स, वॉइस चैट आदि फीचर के साथ-साथ अभिभावक बच्चे की सुरक्षा पर नज़र भी रख सकते हैं।


