कपड़े धोकर 110 करोड़ का टर्नओवर:मां ने कंगन बेचकर IIT कराया, बेटा 84 लाख का पैकेज छोड़ धोबी बन गया
दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सूरजकुंड का इलाका। सुबह के 11 बज रहे हैं। मैं कपड़ा धोने वाली लॉन्ड्री स्टोर में हूं। सामने एक बड़ी वॉशिंग मशीन से तेज घरघराने की आवाज आ रही है। इसमें दर्जनों कपड़ों को धुलने के लिए डाला गया है।
स्टोर के एक कॉर्नर में धुले हुए कपड़ों को आयरन किया जा रहा है, इसकी पैकेजिंग हो रही है। कपड़े को ड्रायर मशीन से निकालकर हैंगर के सहारे सूखने के लिए रखा जा रहा है।
एकदम ऑर्गेनाइज्ड तरीके से गंदे कपड़ों की धुलाई हो रही है। टेक्नोलॉजी, ऐप की मदद से ऑनलाइन गंदे कपड़ों को कस्टमर से लॉन्ड्री तक और फिर लॉन्ड्री से कस्टमर तक पहुंचाया जा रहा है।
आप ये तो सोचने नहीं लग गए कि मैंने पत्रकारिता छोड़कर ड्राई क्लीनिंग की शॉप पर नई जॉब कर ली है। नहीं... नहीं... ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
दरअसल, मैं कपड़े धोने वाली कंपनी ‘UClean’ के एक स्टोर पर हूं। यहां मैं कंपनी के फाउंडर अरुणाभ सिन्हा से मिलने पहुंचा हूं, उनकी बिजनेस के बारे में जानने आया हूं।
जिस तरह से अरुणाभ ने पूरा सेटअप कर रखा है, इससे लग नहीं रहा कि वो कई सालों से धोबी का काम कर रहे हैं। गंदे कपड़ों को धो रहे हैं। मेरे हाव-भाव को देख अरुणाभ कहते हैं, ‘न तो मैं धोबी परिवार से हूं और न मेरा ऐसा कोई फैमिली बैकग्राउंड रहा है।
मैं तो एक आईआईटियन हूं। आप मुझे आईआईटियन धोबीवाला बुला सकते हैं। लोगों को लगता है कि कपड़ा धोने का काम सिर्फ एक विशेष समुदाय के लोग ही कर सकते हैं। दूसरे समुदाय खासकर जिन्हें हमारा समाज ऊंची जाति कहकर संबोधित करता है उनमें से कोई ये काम करे, उन्हें हम 'धोबी' कहकर ताना मारते हैं। ओछी नजरों से देखते हैं।
2016-17 में मैंने इस कंपनी की शुरुआत की थी। गंदे कपड़ों को साफ कर आज हम 110 करोड़ का टर्नओवर कर रहे हैं। देशभर के 113 शहरों में 390 से ज्यादा Uclean के स्टोर हैं।’
… तो आपका फैमिली बैकग्राउंड क्या रहा है?
अरुणाभ बताते हैं, ‘दादा अंग्रेजों के जमाने में बैरिस्टर थे और पापा 9 भाई-बहन। पापा बताते हैं कि ऐशो-आराम में सभी की जिंदगी बीत रही थी, लेकिन दादा-दादी की मौत के बाद घर की स्थिति बहुत खराब हो गई।
आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया… जैसा हिसाब हो गया। 60 के दशक की बात है। पापा की उम्र तकरीबन 9 साल रही होगी। उन्हें जॉन्डिस यानी पीलिया हो गया था। गलत इन्जेक्शन की वजह से रातों-रात पापा की 80% सुनने की क्षमता चली गई। अभी वो सिर्फ 5% ही सुन पाते हैं।
किसी तरह से उन्होंने MBBS की पढ़ाई की, जो उस वक्त B.Sc करने के बाद होता था। स्टडी कम्प्लीट करने के बाद पापा मेडिकल कॉलेज में ट्यूशन पढ़ाने लगे। महीने की उनकी महज 800 रुपए सैलरी थी।
घर की स्थिति इतनी खस्ता थी कि एक रेडियो खरीदने तक के पैसे नहीं थे। मैं 5 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाता था। कभी-कभार मिनी बस से भी चला जाता था। 20 सीटर की बस में 80 लोग ठूंसे होते थे।
घर के हालात देख मम्मी ने ठान लिया था कि नमक-रोटी खाकर भी बच्चों को पढ़ाना है। मेरे मन में भी था कि इस दलदल से परिवार को निकालना है।’
अरुणाभ ने IIT बॉम्बे से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। यहां तक पहुंचने के संघर्ष के दिनों को याद कर वो ठहर जाते हैं।
अरुणाभ कहते हैं, ‘हम लोग भागलपुर के रहने वाले हैं, लेकिन बचपन से जमशेदपुर में पले-बढ़े। पापा यहीं के एक मेडिकल कॉलेज में ट्यूशन पढ़ाते थे। जिस बस्ती में हम लोग रहते थे, वहां तीन-चार दिनों तक पानी नहीं आता था।
बस्ती में कोई सुविधा नहीं थी, यहां तक की बिजली भी नहीं। दूसरी तरफ टाटा इंडस्ट्री थी, जहां हर तरह की सुविधा। तरसता था कि मेरे इलाके में ऐसी सुविधा कब होगी।
8वीं में जब गया, तो IIT JEE के बारे में सुना। मेरे सर्कल के सीनियर हमेशा कहा करते थे कि यदि IIT चले गए, तो लाइफ सेट हो गई। मैं सोचता था कि इंजीनियरिंग करूंगा, फिर वापस जमशेदपुर आकर टाटा में जॉब।
बस इतना सा सपना लेकर मैं इंजीनियरिंग एंट्रेस की तैयारी करने लगा। मुझे पढ़ने-पढ़ाने का इतना शौक था कि 8वीं में रहते हुए मैंने 11वीं-12वीं के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। फाइनली IIT बॉम्बे में मेटलर्जी डिपार्टमेंट में एडमिशन मिल गया, लेकिन बात फीस पर आकर अटक गई।'
बातचीत करते-करते अरुणाभ अपने मोबाइल में कुछ तस्वीर देखने लगते हैं। ये उनके मम्मी-पापा की तस्वीर है। वो कहते हैं, ‘मम्मी ने अपनी शादी के कंगन बेचकर कॉलेज फीस भरी थी।
जब IIT बॉम्बे में सिलेक्शन हुआ, तो हम लोग बहुत खुश हुए। लगा कि सरकारी यूनिवर्सिटी है, कोर्स की फीस सालाना 5-10 हजार रुपए होगी, लेकिन जब काउंसलिंग में गया, तो पता चला कि एक सेमेस्टर की फीस 50 हजार है।
मेरे तो होश उड़ गए, पैरों तले जमीन खिसक गई। कोई और उपाय न देख, मम्मी ने शादी के कंगन को बेचने का फैसला कर लिया। दूसरे सेमेस्टर में चाचा ने फीस के पैसे दिए। इस तरह से जैसे-तैसे करके मेरी इंजीनियरिंग कम्प्लीट हुई।’
हम लोग अब लॉन्ड्री स्टोर से अरुणाभ के कॉर्पोरेट ऑफिस में आ चुके हैं। यहां किसी टेक कंपनी की तरह उनके स्टाफ मेंबर्स लैपटॉप पर काम कर रहे हैं। कंपनी की स्ट्रैटजी बना रहे हैं। साथ में अरुणाभ की पत्नी गुंजन भी हैं।
अरुणाभ मुझे UClean की शुरुआत को लेकर दिलचस्प किस्सा बताते हैं।
कहते हैं, ‘कॉलेज जाने से पहले तक यही लग रहा था कि इंजीनियरिंग करने के बाद टाटा में जॉब करूंगा, लेकिन जब वहां गया तो देखा कि हर कोई अपना कुछ करने के बारे में सोच रहा है। बिजनेस को लेकर आइडिया पिच कर रहा है।
कॉलेज पास आउट होने के बाद मैं विदेश गया। उस वक्त वहां ऑनलाइन लॉन्ड्री का क्रेज शुरू हुआ था। मैंने अपना एक अलग बिजनेस शुरू किया, जिसमें इंटरनेशनल ब्रांड को इंडिया में सेटल होने में हम मदद करते थे।
उस वक्त बड़े-बड़े इंटरनेशनल ब्रांड इंडिया आ रहे थे। कुछ साल बाद मैं एक बड़ी होटल चेन इंडस्ट्री के साथ काम करने लगा। अच्छा-खासा लाखों में पैकेज था, सालाना 84 लाख की सैलरी।
इस इंडस्ट्री में आने के बाद मैंने देखा कि बजट होटल (5 स्टार या 3 स्टार होटल से इतर) में कस्टमर को सबसे ज्यादा दिक्कत तकिया, चादर, कंबल, तौलिया… इन चीजों के गंदे होने की वजह से होती है। यही हाल सैलून और रेस्टोरेंट में भी होता है।
होटल समेत दूसरी इंडस्ट्री के लोग परेशान रहते हैं कि उन्हें लॉन्ड्री सर्विस बेहतर नहीं मिल पा रही है। जब मैंने देखा कि इंटरनेट के दौर में भी यह एक अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर है, लेकिन इसके पीछे करोड़ों का कारोबार छुपा हुआ है।
तब लगा कि मेरा काम सिर्फ होटल के ऑपरेशन को देखना नहीं, इसके सॉल्यूशन को भी ढूंढना है। यही से ऑनलाइन लॉन्ड्री सर्विस का आइडिया आया।’
अरुणाभ 2015-16 का वाकया बताते हैं।
कहते हैं, ‘इसी दौरान मेरी शादी हुई थी। जब मैंने इस प्रॉब्लम को अपनी पत्नी गुंजन के साथ शेयर किया, तो उसे भी इस बिजनेस में जबरदस्त पोटेंशियल दिखा। लगा कि यदि अभी हम लॉन्ड्री बिजनेस को शुरू नहीं करते हैं, तो कभी नहीं कर पाएंगे। यह सही समय है।
इंडिया में उस वक्त तक पुराने तौर-तरीकों से ही लॉन्ड्री सर्विस थी, लेकिन विदेशों में ऑनलाइन लॉन्ड्री सर्विस का कॉन्सेप्ट शुरू हो चुका था। हम दोनों पति-पत्नी ने मिलकर इस पर काम करना शुरू कर दिया।’
… तो आपने जॉब छोड़ दी?
अरुणाभ कहते हैं, ‘जॉब के साथ-साथ लॉन्ड्री कंपनी शुरू करना बहुत मुश्किल था। मेरा लाखों में पैकेज था, इसलिए ये आसान भी नहीं था। जब गुंजन ने कहा कि मैं जॉब छोड़ दूं, वो घर को संभाल लेगी, तब मैंने जॉब छोड़ बिजनेस पर फोकस करना शुरू कर दिया।’
घरवाले राजी हो गए?
अरुणाभ हंसने लगते हैं। बताते हैं, ‘जब मैंने ये बात घर पर बताई, तो मानो भूकंप आ गया। सभी का यही कहना था कि IIT करके धोबी का काम करोगे? दूसरों के गंदे, मैले कपड़े धुलोगे? सबसे ज्यादा तो रिश्तेदार ताने मारने लगे।
कहने लगे- टीचर का बेटा होकर धोबी का काम करेगा। जब यही करना था, तो फिर IIT करने की क्या जरूरत थी। मां-बाप का पैसा डुबो दिया। मां ने कंगन बेचकर पढ़ाया, आज बेटा लाखों का पैकेज छोड़ धोबी का काम करने लगा।’
अरुणाभ कहते हैं कि एक तरफ उन्हें लॉन्ड्री में बहुत बड़ा बिजनेस दिख रहा था। दूसरी तरफ सोसाइटी का ताना। वो बताते हैं, ‘कपड़े धोना, सैलून चलाना… इन कामों को आज भी सोसाइटी गंदी नजरों से देखती है।’
आपने इस काम को कैसे सीखा?
अरुणाभ कहते हैं, ‘होटल इंडस्ट्री से मेरा वास्ता पहले से था ही। 2017 में दिल्ली की दो लोकेशन पर UClean की शुरुआत की। एक ऐप के जरिए मैंने लॉन्ड्री वालों को ऑनबोर्ड किया, उन्हें कंपनी के साथ जोड़ा।
टेक्निकली इन्फ्रास्ट्रक्चर में तकरीबन 5 लाख का इन्वेस्टमेंट करना पड़ा।
आज मेरे पूरे देश में 390 से ज्यादा आउटलेट्स हैं। यह फ्रेंचाइजी मॉडल बेस्ड है। एक फ्रेंचाइजी को ऑनबोर्ड करने में करीब 18 लाख का इन्वेस्टमेंट आता है।’
फ्रेंचाइजी देने के बाद किस तरह की परेशानी होती है इस पर एक अनुभव सुनाते हैं।
कहते हैं, ‘हैदराबाद में एक Uclean का आउटलेट मैंने सेट किया था। उसकी ओनर एक लड़की थी। कुछ महीने बाद उस लड़की ने बताया कि उसके घरवाले, गांव वाले उसे परेशान कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि लड़की होकर दूसरों के गंदे कपड़े साफ कर रही हो।
बात आउटलेट के बंद होने पर आ गई। मैंने सोचा कि यदि अभी ही ये आउटलेट बंद हो गया, तो फिर कंपनी पर सवाल उठेंगे। लोगों का भरोसा खत्म होने लगेगा। इंडस्ट्री में मैसेज जाएगा कि UClean के स्टोर्स खुलने से पहले ही बंद होने लगे हैं।
कई महीनों तक मैंने उस आउटलेट को चलाया, फिर बाद में दूसरे व्यक्ति के साथ डील की। बाद में बिजनेस को बूस्ट करने के लिए हमने कुछ सेलिब्रिटी के साथ टाइअप किया। ’
आपका मॉडल काम कैसे करता है?
अरुणाभ बताते हैं, ‘जिन लोकेशन पर हम काम कर रहे हैं, वहां का कोई भी कस्टमर मेरे वेबसाइट या ऐप के जरिए लॉन्ड्री सर्विस यूज कर सकता है। जैसे ही कस्टमर UClean के प्लेटफॉर्म पर सर्विस के लिए रिक्वेस्ट डालता है, नजदीक के UClean स्टोर पर पूरी डिटेल्स चली जाती है।
सिलेक्टेड डेट और टाइम के मुताबिक हमारे सर्विस प्रोवाइडर कस्टमर से जाकर कपड़े पिक करते हैं और फिर इसे लॉन्ड्री के बाद डिलीवर कर देते हैं। अभी कंपनी का टर्नओवर 110 करोड़ है और 50 से ज्यादा लोगों की टीम काम कर रही है।
20% रेवेन्यू हम बिजनेस टु बिजनेस मॉडल से जनरेट करते हैं, जबकि 80% डायरेक्ट कस्टमर से। लोकेशन वाइज होटल, रेस्टोरेंट और सैलून जैसी इंडस्ट्री हमारी रोज की कस्टमर है।’
‘कम ही लोग यह जानते होंगे कि किसान के बेटे के लिए खेत की फसल पर कॉलेज की फीस निर्भर करती है। फसल अच्छी होगी, तो उसके कॉलेज-स्कूल की फीस जमा होगी, नहीं तो नहीं। यही देखते हुए मैं बड़ा हुआ। जब केमिकल इंजीनियरिंग कर रहा था, तो समझ में आया कि किसानों की आमदनी न बढ़ने का एक मुख्य कारण सही खाद का न मिलना होता है।
घर के आंगन से 5 हजार की लागत से बायो फर्टिलाइजर खाद बनाना शुरू किया। तब इस बात की उम्मीद नहीं थी कि कंपनी फायदे में जाएगी। आज सालाना टर्नओवर एक करोड़ से अधिक का है। कंपनी की वैल्यूएशन 50 करोड़ है।’
Kumkum sharma 

