रिटायर्ड एएसपी की सोच बनी 25 लाख गरीबों को भोजन: 19 साल से जारी है सेवा का सफर, दान-पुण्य के नाम पर जुड़ चुके हैं 15 सौ ट्रस्टी, एक कील तक की होती है ऑडिट

रिटायर्ड एएसपी की सोच बनी 25 लाख गरीबों को भोजन: 19 साल से जारी है सेवा का सफर, दान-पुण्य के नाम पर जुड़ चुके हैं 15 सौ ट्रस्टी, एक कील तक की होती है ऑडिट
कोरोनाकाल में एहतियात के तौर पर धर्मशाला के खुले में खड़ी परिजनों की कतार को भोजन परोसते ट्रस्टी।

महात्मा गांधी राजकीय अस्पताल परिसर में बनी धर्मशाला को सरकारी कार्यालय बनाने के लिए चर्चा क्या हुई बांसवाड़ा में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रहते हुए भारत सिंह सिसोदिया ने इस फैसले पर विरोध दर्ज कराया। वर्ष 2002 में तत्कालीन जिला कलेक्टर राजीव ठाकुर से एएसपी सिसोदिया कहते दिखे कि लोग तो धर्मशाला बनवाते हैं। आप बनी हुई बिल्डिंग को बिखेरना चाहते हैं। बस यही वे पल थे, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के एक महीने पहले भारतसिंह को समाज सेवा की ओर मोड़ दिया। उनके अपनों से चर्चा कर एएसपी सिसोदिया ने बांसवाड़ा और डूंगरपुर की सोच के साथ वागड़ सेवा संस्थान ट्रस्ट की नींव रख दी। जनजाति बाहुल्य बांसवाड़ा जिले में वर्ष 2002 में धर्मशाला की व्यवस्था ही नहीं संभाली बल्कि अस्पताल में भर्ती मरीजों के साथ दूरदराज से आने वाले उनके परिजनों को दो समय भोजन की सुविधा भी उपलब्ध कराई। इसी का नतीजा है कि इस संस्था ने जनवरी 2020 तक 25 लाख 12 हजार 323 गरीब लोगों को भोजन का रिकॉर्ड भी बनाया है।

जेल से आने वाले कैदी हो या फिर उनके साथ आने वाला स्टाफ हो। उन्हें दो समय के भोजन की सुविधा का सहारा रहता है। कुल 50 लोगों के साथ शुरू हुए इस कारवें में अब तक 15 सौ ट्रस्टी शामिल हो चुके हैं। संस्था की ऑडिट रिपोर्ट की मानें तो संस्था ने 10 अक्टूबर 2002 से जनवरी 2020 तक बांसवाड़ा धर्मशाला में 3 करोड़ 95 लाख 54 हजार रुपए खर्च किए जा चुके हैं।

यह है बांसवाड़ा की वागड़ सेवा धर्मशाला।
यह है बांसवाड़ा की वागड़ सेवा धर्मशाला।

डूंगरपुर और उदयपुर में भी सक्रिय
चूंकि डूंगरपुर वागड़ में शामिल है और उदयपुर संभाग मुख्यालय है। वहीं सेवानिवृत्ति के बाद खुद एएसपी सिसोदिया यहां उदयपुर शिफ्ट हो गए थे। सेवा भावना की सोच ने उन्हें उदयपुर के महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय परिसर में जगह दिलाई।

डूंगरपुर में 10 अक्टूबर 2008 में धर्मशाला खोली गई, जो शुद्ध तौर पर धर्मशाला है। वहां 35 और 50 रुपए में गरीब लोगों को ठहरने के साथ बिस्तर, साबुन जैसी सेवाएं दी जाती हैं। इसी तरह उदयपुर में 2 अक्टूबर 2014 में वैद्य भागीरथ जोशी धर्मशाला शुरू हुई। वहीं एमबी हॉस्पिटल के इसी परिसर में भंडारी सराय भी संचालित है, जो कि संभाग और दूरदराज से आने वाले गरीबों को रहने और खाने जैसी सुविधाएं मुहैया कराती है।

जेल के कैदियों और साथ आए पुलिस जवानों के लिए पैक हो रहा भोजन।
जेल के कैदियों और साथ आए पुलिस जवानों के लिए पैक हो रहा भोजन।

सरकारी खाते का एक रूपया भी नहीं
वागड़ ट्रस्ट का कड़वा सच है कि यहां बांसवाड़ा के जिला अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों को सुबह-शाम दाल, सब्जी, चावल और चपाती परोसी जाती है। वहीं प्रसूताओं को प्लेन दलिया, मूंग दलिया और दूध जैसी सुविधा अलग से दी जाती है।

इतना सब कुछ होने के बाद भी इस संस्था ने सरकार के कोष से एक रुपए का सहयोग आज तक नहीं लिया। हालांकि, एमजी हॉस्पिटल प्रशासन ट्रस्ट को सहयोग के लिए कई बार ऑफर भी दिए। यह कहते हुए कि दलिया और दूध के पैसे सरकार अस्पताल को देती है, लेकिन उनके यहां संस्था की ओर से यह निशुल्क दिया जाता है। ऐसे में सरकारी बजट को संस्था के खाते में डाल दो, लेकिन संस्था ने निस्वार्थ उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे सहयोग से इनकार कर दिया।

धर्मशाला की शिलान्यास पटि्टका पर लिखा हुआ निजी सहयोग।
धर्मशाला की शिलान्यास पटि्टका पर लिखा हुआ निजी सहयोग।

परिसर सरकारी, बिल्डिंग निजी
वागड़ सेवा धर्मशाला का एक सच यह भी है कि अस्पताल परिसर में जमीन तो सरकारी है, लेकिन बिल्डिंग का निर्माण निजी सहयोग से हुआ है। यहां की शिलान्यास पटि्टका को देखने से पता चलता है कि तब जानीदयालाल की स्मृति में लाल मनु भाई परिवार की ओर से इस बिल्डिंग निर्माण के लिए 1995 में 51 हजार रुपए का सहयोग मिला था। इसका उद्घघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने शुभारंभ किया था।

कोरोनाकाल में भर्ती मरीजों के परिजनों की कतार।
कोरोनाकाल में भर्ती मरीजों के परिजनों की कतार।

कोरोना पर भी रहे भारी
बांसवाड़ा अस्पताल परिसर में संचालित धर्मशाला का उद्देश्य कोरोनाकाल में भी प्रभावित नहीं हुआ। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों को यहां से नियमित भोजन सुविधा महुैया कराई गई। संक्रमण से बचने के लिए लोगों को भोजन खुले में परोसा जाने लगा। लोग यहां गार्डन में बैठकर भोजन करने लगे हैं। वहीं डस्टबिन में दोने-पत्तल डाले जाते हैं। कोरोना के इन दो साल से पहले लोगों को एक हॉल में स्टील के बर्तनाें में भोजन कराने की सुविधा थी। अब धर्मशाला के गेट पर ही भोजन बांटा जाता है।

रिलायंस समूह के कार्यक्रम में सेवा कार्य को लेकर एएसपी भारत सिंह को मिला सम्मान।
रिलायंस समूह के कार्यक्रम में सेवा कार्य को लेकर एएसपी भारत सिंह को मिला सम्मान।

राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित
धर्मशाला के प्रेरणा स्त्रोत रिटायर्ड एएसपी भारतसिंह सिसोदिया की बात करें तो उन्हें नौकरी में रहते हुए राष्ट्रपति पदक मिल चुका है। डूंगरपुर के नांदली गांव में जन्में भारतसिंह ने राजस्थान पुलिस में करीब 30 साल से अधिक सेवाएं दी। उनका अधिकांश कार्यकाल बांसवाड़ा जिले में गुजरा था। सेवानिवृत्ति के बाद वह उदयपुर शिफ्ट हो गए।
पुण्यतिथि और जन्मदिन की रसीद
संस्था की ओर से प्रतिदिन करीब 5 सौ लोगों को नि:शुल्क भोजन कराया जाता है। यह जानते हुए शहर के बहुत से लोग परिजनों की पुण्यतिथि, दान-पुण्य और बच्चों के जन्मदिन जैसे अवसरों पर गरीबों को भोजन कराने के नाम पर यहां 25 सौ रुपए की रसीद कटाते हैं। उनका इतना सहयोग उनके परिश्रम को बचाता है तो संस्था को आर्थिक सहारा मिल जाता है। इसके लिए यहां बकायदा कलेण्डर बना रहता है। जबकि, सरकारी योजना में इंदिरा रसोई के नाम पर प्रति थाली 8 रुपए लिए जाते हैं।
बेहतर के लिए प्रयास
बांसवाड़ा में वागड़ ट्रस्ट के सचिव अभय कोठारी की मानें तो व्यवस्था के तहत संस्था का प्रतिनिधि हर रोगी वार्ड में जाता है। वह यहां पर भर्ती मरीजों के साथ उनके आए हुए परिजन की जानकारी लेता है। फिर मौके पर परिजनों को भोजन की स्लिप दी जाती है। इसे लेकर परिजन धर्मशाला आते हैं तो उन्हें भोजन दिया जाता है। प्रसूताओं को ध्यान में रखकर दलिया और दूध अलग से तैयार होता है। इसका कारण है कि भोजन की बर्बादी नहीं हो। लोगों के संख्या अनुपात को ध्यान में रखकर ही भोजन बने।