खेती के लिए टापू तक तैरकर पहुंचते हैं बैल, पानी में से ट्रैक्टर निकाल ले जाते हैं किसान
माही नदी के बैक वाटर में कई खूबसूरत टापुओं के बीच किसानों के जीवन का अथाह संघर्ष फैला हुआ है। यहां बारिश के सीजन में अधिकतर टापू डूब जाते हैं। अक्टूबर में फसलाें के लिए पानी छाेड़ने के साथ ही टापुओं से पानी उतरना शुरू हाेता है। टापू दिखने के बाद किसान वहां खेती की तैयारी करते हैं।
इस दौरान इन टापुओं से लगते हुए एक भाग पर पानी घटकर 5 से 6 फीट तक आ जाता है। किसान यहीं से पानी के बीच से निकालकर ट्रैक्टर खेतों तक ले जाते हैं। बैलाें काे पानी में तैराकर टापू पर ले जाते हैं। बुआई से फसल कटाई तक कई दिन किसानों की जिंदगी टापू पर ही कटती है।
सूखे पेटे में बाेते हैं गेहूं, चने, मक्का और ककड़ी
लहराता परिणाम
लहराता परिणाम
इन टापुओं पर जैसे-जैसे पानी कम हाेता जाता है कि कई नए टापू निकलने लगते है। किसान यहां गेहूं, चना, मक्का और ककड़ी की बुवाई कर देते हैं। जनवरी में गेहूं की बुवाई हाेती है। जुलाई से बारिश शुरू हाेने पर अगस्त से टापू डूबना शुरू हाे जाते हैं। दिसंबर तक यही स्थिति रहती है। डूब क्षेत्र के आसपास बसे काेटड़ा, चाचाकाेटा, दनाक्षरी, सिताब सहित 112 गांवाें के लाेग यहां खेती करते हैं।


