पढ़े-लिखों को लूट रहे अनपढ़ ठग, ऑनलाइन सीखते हैं अलग-अलग भाषा, OLX पर ठगने के लिए होती है पूरी ट्रेनिंग; सेना की फर्जी आईडी और सोशल साइट से कर रहे ठगी
भरतपुर का मेवात इलाका ठगों का गढ़ माना जाता है। यहां टटलूबाजों यानी ठगी करने वालों की नई नस्ल तैयार हो रही है। अनपढ़ होने के बावजूद ये लोग ज्यादा शातिर और चालाक हैं। जो पढ़े-लिखे लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। गिरोह के मुखिया OLX पर ठगने के लिए इन नई नस्लों को तैयार कर रहे हैं। यह ठग मोबाइल से नई-नई तकनीकों का पता लगा लाखों रुपए की ठगी चंद सेकेंड में ही कर देते हैं।
मोबाइल पर महंगे सामान को सस्ते में बेचना। खुद को सेना का जवान बताकर लोगों का विश्वास जीतना। इन ठगों के लिए बहुत ही आसान हो गया है। फिर महंगी कारों को सस्ते दामों में बेचने का झांसा देकर लूटना, इनके लिए आम बात है। टटलूबाजों को तैयार करने के लिए गैंग के लीडर पूरी ट्रेनिंग देते हैं। इसके लिए पहले अंग्रेजी बोलने की ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद जिस इलाके में ठगी करनी है या अधिकारी बनकर ठगी करनी है। उसके हिसाब से ट्रेनिंग देते हैं।
टटलूबाज बनने से पहले होती है ट्रेनिंग
भरतपुर के आसपास के गई गांव टटलूबाजी का गढ़ माना जाता है। ठगी करने से पहले ठग को बहुत कुछ सिखना पड़ता है। मोबाइल से अलग-अलग स्टेट की भाषा सिखने की ट्रेनिंग दी जाती है। मेवात इलाके के कई ऐसे टटलूबाज हैं जो गुजराती, बिहारी और इंग्लिश तक जानते हैं। जो भाषा नहीं बोल पाते वे मोबाइल पर उन्हें कंवर्ट कर बोलते हैं। अपनी बातों में फंसा लेते हैं।
ऐसे शुरू होता है क्लासीफाइड साइट से ठगी का खेल
इसके बाद शुरू होता है झांसे में फंसाने का खेल। दैनिक भास्कर के कैमरे के सामने आए इस टटलूबाज ने बताया कैसे यह क्लासीफाइड साइट में फर्जी विज्ञापन देकर लाखों रुपए की ठगी करते हैं। सबसे पहले सोशल साइट पर किसी भी सामान बेचने के लिए एक ऐड डाला जाता है। उसमें टटलूबाज का नंबर होता है। यह विज्ञापन किसी एक शहर के लिए होता है। जैसे ही कोई व्यक्ति उनसे कॉन्टेक्ट करता है तो टटलूबाज खुद को उसी शहर के आसपास का बताता है। टटलूबाज के पास उस शहर के फर्जी आईडी कार्ड भी होते हैं। जिसे दिखाकर वह झांसे में लेता है। कोरोना या कोई और बहाना बताकर यह कहा जाता है कि गाड़ी या सामान होम डिलीवरी होगी। इसके लिए अपने डॉक्यूमेंट ऑनलाइन भेजें। जैसे ही वह अपने डॉक्यूमेंट भेजता है तो खरीदने वाले यानी पीड़ित से डिलीवरी चार्ज मांगा जाता है। इसके बाद इंश्योरेंस के अलग से रुपए लिए जाते हैं।
वाहन खरीदने वाले व्यक्ति से इंश्योरेंस की रकम 9 हजार 999 या 5 हजार 999 के डिजिट में ली जाती है। पीड़ित जब इंश्योरेंस के पैसे टटलूबाज को भेज देता है तो उसे झांसे में लिया जाता है। अलग-अलग चार्ज बताकर रुपए ठगे जाते हैं। जैसे-जैसे ठग बोलता है पीड़ित वैसा करता जाता है। जब गाड़ी भेजने की बात आती है तो उसे ठग कहता है कि अब देरी हो गई है। 11 हजार रुपए जमा कराने पर गाड़ी मिलेगी। ऐसे करते हुए उससे करीब 1 लाख रुपए तक की ठगी कर लेते हैं।

सेना के अधिकारी बनकर करते हैं ठगी, फर्जी आईडी कार्ड तक तैयार रखते हैं
सबसे अधिक ठगी इन क्लासिफाइड साइट पर सेना के अधिकारी या जवान बनकर की जाती है। इसके लिए गूगल से किसी भी सेना के अधिकारी का फोटो उठा लिया जाता है। उसके नाम का फर्जी आईडी कार्ड बना देते हैं। सामान खरीदने वाले को झांसा देते हैं कि वह सेना में अधिकारी है। ट्रांसफर की वजह से सामान बेचना चाहते हैं। फर्जी आईडी कार्ड देखकर हर कोई इनके झांसे में आ जाता है। ठगी का शिकार हो जाता है।

कैसे शुरू हुआ टटलूबाजी का खेल
सबसे पहले कुछ लड़के बाहर के शहरों से यह काम सीख कर आए। उन्होंने यह काम मेवात इलाकों के कई लड़कों को सिखाया। इस समय ज्यादातर लड़के इसी काम को कर रहे हैं। अब धीरे-धीरे युवकों की रुचि टटलूबाजी को लेकर बढ़ती जा रही है।


