राज्य सरकार की पहल सड़क हादसे में घायल की मदद कर अस्पताल पहुंचाइए, सरकार देगी ‌‌‌5 हजार का इनाम

राज्य सरकार की पहल सड़क हादसे में घायल की मदद कर अस्पताल पहुंचाइए, सरकार देगी ‌‌‌5 हजार का इनाम

सड़क हादसाें में घायल की मदद की और उसकी जान बचा पाए ताे आपकाे सरकार 5 हजार रुपए का इनाम भी देगी। यह अभिनव पहल राजस्थान सरकार ने इसी बजट से शुरू की है। इस संबंध में सीएम अशाेक गहलाेत ने बुधवार काे पेश किए बजट में घाेषणा की। जिला पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि चार सालाें में जिले में 1196 हादसाें के मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनमें 773 लाेगाें काे जान गंवानी पड़ी जबकि 1287 लाेग गंभीर घायल हाे गए थे।

यह आंकड़ा जिला स्तर पर छाेटा हाे सकता है लेकिन इसी तरह हर जिले में सैकड़ाें हादसाें में हर साल लाेग जान गवां देते हैं। बड़ा कारण यह है कि जब हादसा हाेता है ताे घायलाें काे तुरंत मदद नहीं मिल पाती। घायलाें काे प्राथमिक उपचार ही देरी से मिलता है। इस कारण घायलाें में मरने वालाें की संख्या ताे बढ़ती ही है साथ ही गंभीर घायलाें के अंगभंग हाेने तक की नाैबत आ जाती है। सामान्यतया लाेगाें में धारणा बनी हुई है कि घायलाें काे अस्पताल पहुंचाने पर पुलिस परेशान करेगी तथा अस्पताल में भी कई तरह के सवालाें के जवाब देने पड़ेंगे।लेकिन यह सच नहीं है।

सुप्रीम काेर्ट ने इस संबंध में स्पष्ट व्याख्या की है कि सड़क हादसाें में घायलाें की मदद करने वालाें से पुलिस पूछताछ नहीं करेगी। दूसरा हादसाें में घायलाें काे नजदीक के किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल में भर्ती करवाया जा सकेगा। निजी अस्पताल में इलाज के लिए काेई पैसाें की मांग नहीं करेगा। अगर निजी अस्पताल प्रबंधन इलाज में देरी करता है।

इस दाैरान घायल की जान चली जाती है अथवा अंगभंग की स्थिति बनती है ताे अस्पताल प्रबंधन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाएगा। हालांकि प्रशासन की ओर से इस संबंध में प्रचार प्रसार की कमी व अन्य कारणाें से बहुत से लाेग इस बात से अनभिज्ञ हैं। अब सीएम ने घायलाें की मदद करने वालाें काे 5 हजार के पुरस्कार की घाेषणा भी कर दी है।

शुरू का आधा घंटा महत्वपूर्ण, अस्पताल पहुंचे ताे बच सकती है जान
जिला अस्पताल के ऑर्थाे सर्जन डाॅ. केके जाखड़ बताते हैं कि सड़क हादसे में घायल के लिए शुरूआती आधा घंटा बहुत अधिक महत्वपूर्ण हाेता है।इस अवधि में मदद मिल जाए ताे 90 फीसदी चांस हाेते हैं कि मरीज काे बचाया जा सकेगा।
हालांकि वर्तमान में हमारी चिकित्सा व्यवस्थाएं ऐसी हैं कि घायल काे 6 घंटे में हायर सुपर स्पेशिलिटी सेंटर भी पहुंचाया जा सकता है। इससे अंगभंग हाेने से भी बचाया जा सकता है।
हमने खुद ऐसे सैकड़ाें मामले देखे हैं, जिनमें घायलाें के बचने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन तत्काल उपचार मिलने के कारण बचा लिए गए। इसलिए हादसाें के तुरंत बाद जितनी जल्दी मदद मिले, मरीज के लिए उतना ही फायदेमंद हाेता है।

2016 में सुप्रीम काेर्ट की डबल बैंच ने दिया था निर्णय अस्पताल पहुंचाने वाले से पुलिस पूछताछ नहीं करेगी
सड़क हादसाें में घायलाें की मदद करने वाले एक व्यक्ति काे पुलिस द्वारा प्रताड़ित करने के एक मामले काे लेकर सेव लाइफ फाउंडेशन ने सुप्रीम काेर्ट की डबल बैंच में 2012 में याचिका दायर की थी। 2016 में 30 मार्च काे इस पर डबल बैंच ने 22 पेज का महत्वपूर्ण निर्णय दिया।

जस्टिस वी गाेपाला गाेवदा व जस्टिस अरुण मिश्रा की बैँच ने व्यवस्था दी कि देश में सड़क हादसाें में घायलाें काे अस्पताल पहुंचाने वाले नागरिकाें से पुलिस पूछताछ नहीं करेगी। यह भी कहा कि हादसे के तुरंत बाद का समय ‘गाेल्डन पीरियड’ हाेता है जिसमें सार्थक मदद मिले ताे घायलाें की जान बचाई जा सकती है। इस आदेश से पहले निजी अस्पताल घायलाें काे भर्ती करने से पहले इलाज शुरू करने के नाम बड़ी रकम के भुगतान के डर से भी घायलाें मदद से लाेग कतराते थे। परिणाम स्वरूप घायल काे नजदीकी अस्पताल पहुंचाने में काफी देरी हाे जाती थी।