कोरोना की मार:भरतपुर में 1700 से ज्यादा छोटे स्कूल आर्थिक संकट में, किसी ने किराने की दुकान खोली तो कोई चला रहा डेयरी
भरतपुर: लॉकडाउन और कोरोना के खतरे की वजह से जिले में 1700 से ज्यादा छोटे और मझोले प्राइवेट स्कूल संकट में आ गए हैं। पिछले 4-5 महीने से लगभग 3 लाख 20 हजार स्टूडेंट्स की फीस नहीं आई है। इस वजह से 34 हजार से ज्यादा शिक्षक और अन्य कर्मचारियों का वेतन-भत्ते आदि बकाया हो गए हैं। जबकि स्कूलों पर बिजली-पानी के बिल, स्टाफ की सेलरी, स्कूली वाहनों की किस्तें आदि खर्चों का भार बराबर बना हुआ है। कई स्कूलों ने जहां शिक्षकों और अन्य स्टाफ को नौकरी से हटा दिया है।
वहीं स्कूल बंद होने से कुछ स्कूल संचालकों का खुद का घर खर्च चलना भी मुश्किल हो गया है। आर्थिक संकट की वजह से प्रदेश मेंं स्कूलों से जुड़़े 10 लोग तो आत्महत्या तक कर चुके हैं। चूंकि अभी भी तय नहीं है कि स्कूल कब से खुलेंगे। कुछ लोगों ने परिवार चलाने के लिए दूसरे काम-धंधे शुरू कर लिए हैं। भास्कर संवाददाता ने पिछले 4-5 माह से बंद पड़े छोटे-मझोले स्कूल संचालक और शिक्षकों आदि से बात करके पूरे मामले की पड़ताल की। वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया।
इस दौरान पता चला कि कोई स्कूल संचालक जो पहले 10-12 लोगों को रोजगार दे रहा था। वह अब किराने की दुकान चला रहे हैं। कोई शिक्षक दूध डेयरी चल रहा है तो किसी को गांव-गांव जाकर तरबूज और सब्जियां बेचनी पड़ रही है। ऐसा ही कुछ हाल छोटे कोचिंग क्लासेज वालों का भी लगभग यही हाल है।


