जयपुर में दिखी दुर्लभ पक्षी:साइबेरिया के जंगलों की दुर्लभ चिड़िया लेसर वाइट फ्रंटिड गूज पहली बार जयपुर में दिखी
राजधानी के बाहरी इलाके चंदलाई बरखेड़ा के इलाके में गुरुवार को दुर्लभ मानी जाने वाली और टुंड्रा वनों की मूलनिवासी एक बेहद खूबसूरत चिड़िया ‘लेसर वाइट फ्रंटिड गूज’ दिखाई दी है। जयपुर में तो यह पहली बार दिखाई दी है। प्रदेश में आम तौर पर यह शायद ही कहीं दिखाई देती हो।
दस साल पहले यह चिड़िया एक बार तब चर्चा में आई थी, जब इसे सरिस्का बाघ परियोजना से लगती आबादी टहला के आसपास देखी गई थी। दरअसल, यह पक्षी ‘एग्रीमेंट ऑन दॅ कंजर्वेशन ऑव ऐफ्रिकन-यूरेशियन माइग्रेटरी वाटरबर्ड्स (एईडब्लूए)’ के तहत ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी में है। इस दुर्लभ पक्षी को चंदलाई इलाके में पक्षियों की फोटोग्राफी कर रहे भरतसिंह नरूका ने देखा तो उन्होंने क्लिक किया। पक्षी और प्रकृतिविद राजपालसिंह शेखावत बताते हैं, यह वाकई दुर्लभ पक्षी है और यह जयपुर में पहली बार दिखाई दी है। यह यूरोप के जंगलों में ही अधिकतर रहती है और कभी-कभार बाहर आती है, लेकिन फिर भी भारत नहीं आती।
कई देशों में यह कुछ माह रहती है तो लोग पलक-पांवड़े बिछाए रहते हैं
पक्षीविदों की मानें- गूज यूरोप या फिर उत्तरीय इलाकों में रहती है। भारत और पाक के बाहरी इलाकों में इसे कभी-कभार देखा जाता है। यह सोवियत रूस के बेहद ठंडक वाले ऊपरी इलाकों में अंडे देती और प्रजनन करती है। नॉर्वे, ग्रीस, बुलगारिया, स्वीडन और तुर्की में गूज के लिए विशेष प्रजनन परियोजनाएं चल रही हैं। हंगरी में यह पतझड़ के दो महीने और वसंत में एक माह रहता है। इन 3 महीनों में हंगरीवासी इनके आने का इंतजार करते हैं।
‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी की है गूज
- राजपालसिंह बताते हैं, यह 2013 में गुजरात में दिखाई दी थी तो ‘जर्नल ऑव दॅ बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री साेसाइटी’ ने इस पर ‘फर्स्ट रिकॉर्ड ऑव लेसर वाइट-फ्रंटिड गूज फ्रॉम गुजरात’ शीर्षक से रिपोर्ट छापी थी।
- लेसर वाइट फ्रंटिड गूज ‘एग्रीमेंट ऑन दॅ कंजर्वेशन ऑव ऐफ्रिकन-यूरेशियन माइग्रेटरी वाटरबर्ड्स (एईडब्लूए)’ के तहत ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी में है
- पक्षीविदों के अनुसार यह मीडियम साइज की डार्क चॉकलेट ब्राउन चिड़िया है। माथा सफेद होता है और चोंच एकदम बबलगम पिंक। पक्षीविदों का कहना है कि यह चिड़िया कभी भारत या पाक वाले इलाकों में आती ही नहीं।


