प्रशासन का बजट मातम श्रमिक का कुएं में ही हो गया बारहवां, 5 लाख का बजट नहीं होने से 12 दिन से कुएं में पड़ा है श्रमिक का शव

प्रशासन का बजट मातम श्रमिक का कुएं में ही हो गया बारहवां, 5 लाख का बजट नहीं होने से 12 दिन से कुएं में पड़ा है श्रमिक का शव

सुमेरपुर के कानपुरा गांव में निर्माणाधीन कुएं में 27 सितंबर को मिट्टी धंसने से दबे श्रमिक मूपाराम मीणा का शव 12 दिन बाद भी बाहर नहीं निकाला जा सका है। जिला प्रशासन पहले पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आश्वासन देने की बात कह कुएं को क्रब मानकर राहत कार्य बंद कर चुका है। राज्य सरकार के हस्तक्षेप के बाद पुन शव निकालने के आदेश हुए तो अब बजट की कमी बताकर काम शुरू नहीं किया जा रहा है।

जो वजह बताई जा रही है, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाली है। सिर्फ 5 लाख रुपए बजट के अभाव में काम शुरू नहीं हो पा रहा है। पाली जिले में संभवत: ऐसा पहला मामला है, जब किसी का दाह संस्कार नहीं हुआ और 12वां हो गया। दैनिक भास्कर ने 3 अक्टूबर के अंक में मजदूर के शव को निकालने में प्रशासन की इच्छाशक्ति खत्म होने का खुलासा किया था।

इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जिले के प्रभारी मंत्री सालेह मोहम्मद व प्रभारी सचिव डॉ. समित शर्मा ने दुबारा राहत कार्य शुरू करने के निर्देश दिए थे। हालात यह हैं कि पहले कलेक्टर-एसपी ने दौरा भी नहीं किया था, अब दौरा किया, लेकिन अब तक काम शुरू नहीं हो पाया है। चार तकनीकी अधिकारियों की टीम भी चुप्पी साधे हुए है।

इस संबंध में पाली कलेक्टर अंशदीप अमूमन कोई जबाब नहीं मिलता। वे मीडिया के हर सवाल से बचते हैं इधर, मजदूर मूपाराम मीणा के परिवार के लिए शव के इंतजार में एक-एक दिन निकालना भारी पड़ रहा है। इधर, मीणा समाज ने दो दिन में शव निकालने का काम शुरू नहीं करने पर धरना-प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है।

प्रशासन की इच्छाशक्ति ने दम नहीं तोड़ा होता तो कब का निकल जाता मूपाराम, अब भी न संसाधन की कमी न पैसों की

क्या आप सिर्फ कुआं देखने आए थे, प्रभारी मंत्री की दखल के बाद 5 सितंबर को कलेक्टर अंशदीप व एसपी राहुल कोटोकी ने कानपुरा पहुंचे थे और शव जल्द निकलवाने का आश्वासन दिया था, लेकिन दौरा के बाद दावे सिर्फ आश्वासनों में ही रह गए।

मूपा तो मर गया, आंसू भी सूख गए, अब रस्में तो कर लेने दो

मूपाराम मीणा के भाई जाेगपुरा निवासी दूदाराम मीणा तथा समाज के राजूराम मीणा की अगुवाई में समाज के लाेगाें ने शुक्रवार काे कलेक्टर अंशदीप से मिलकर फिर से गुहार लगाई कि उन्हें किसी तरह से मूपाराम का शव निकलवा कर दे दें। कम से कम सुकून तो मिल जाएगा कि उन्हाेंने मूपाराम की आत्मा की शांति के लिए क्रियाक्रम पूरे कर लिए, वरना ताउम्र यह दर्द सालता रहेगा कि उसके भाई का शव वहीं पर दबा रहा।

अब तो रो-रोकर परिवार के सदस्यों के आंसू भी सूख चुके हैं। मीणा समाज विकास संघ के अध्यक्ष शंभूराम मीणा बलाना ने भी आराेप लगाया कि प्रशासन केवल समय निकाल रहा है। अगर शीघ्र ही शव नहीं निकाला गया ताे आंदाेलन किया जाएगा। भाई ने बताया कि कलेक्टर और सुमरेपुर एसडीएम ने मुलाकात के दौरान कहा था कि बजट आते ही वे काम शुरू करा देंगे।

पांच लाख रुपए का बजट आते ही शुरू करेंगे रेस्क्यू

  • कुएं से शव निकालने का प्लान बनाकर कलेक्टर काे साैंपा था। इसमें लाेहे के फर्में बनाकर उसमें रेत भरकर शव काे निकालना था। कम से कम 5 लाख का बजट मांगा था। बजट मिलते ही कलेक्टर के दिशा-निर्देश पर रेस्क्यू शुरू कर देंगे। - माे. सलीम, एक्सईएन, जलदाय विभाग

एक्सपर्ट व्यू : बहुत फंड व एजेंसियां होती है संसाधनों की कोई कमी नहीं, इच्छाशक्ति जरूरी

  • घटना में मानवता दिखानी जरूरी है। वैसे भी आजकल अपने जिले में भी ऐसे कई संसाधन माैजूद हैं। इसके लिए एलएंडटी कंपनी समेत कई अन्य संस्थाओंं से सहयाेग लिया जा सकता है। काेराेनाकाल के दाैरान भी भामाशाहों के सहयाेग से कई पुनीत कार्य किए हैं। - शंकरलाल परमार, सेवानिवृत्त एसई, सिंचाई विभाग

सरकार! आइए देखिए आपके यहां गुड गवर्नेंस की ऐसे हत्या हो रही

पिछले 12 दिन से कुएं में दबे श्रमिक मूपाराम के परिवार की करुण वेदना को लिखने के लिए शब्द नहीं मिल पा रहे। शब्दों में लिखना नामुमकिन सा ही है। प्रशासन और पुलिस तो उसे पहले दिन से मरा हुआ मान चुकी है, लेकिन उसकी 75 वर्षीय मां चुन्नीबाई पूछ रही है कि मूपा कब घर अाएगा? पत्नी जमना सदमे में है, लेकिन सासू को पता नहीं चल जाए इसलिए अपना दर्द प्रकट नहीं करती।

27 सितंबर से परिवार सदमे में है। आधे-अधूरे संसाधनों से शव निकालने का प्रयास करने वाले प्रशासन ने अब सिर्फ पांच लाख की कमी बता हाथ खड़े कर दिए हैं। इससे बड़ा छल-कपट और कुछ हो सकता है क्या? जिस परिवार के गले में 12 दिन से ठीक से निवाला नहीं उतरा है, उसकी इतनी सी इच्छा है कि शव मिल जाए तो मूपाराम की आत्मा की शांति के लिए विधि-विधान से क्रिया-कर्म हो जाए।

परिवार का भरोसा उस कुएं की तरह भरभरा कर ढहने लगा है, लेकिन जिम्मेदारों का दिल नहीं पसीज रहा। पूरा परिवार और समाज कभी एसडीएम तो कभी कलेक्टर के पास जाकर पगड़ी रखकर कुछ नहीं हो तो अस्थियां ही मिल जाएं इसकी गुजारिश कर रहा है, लेकिन कानों में सीसा भरकर बैठी व्यवस्था को इस वेदना का थोड़ा सा भी अहसास नहीं हो पा रहा, न जाने क्यों? पहले मुआवजा देकर कुएं को कब्र बनाने की कोशिश कर चुके अधिकारी अब जो बात कर रहे हैं वह बहाने से ज्यादा कुछ नहीं है।

संसाधन भी है, लेकिन इन्हें उपयोग में लेने की इच्छाशक्ति न जाने क्यों नहीं दिखा रहे। कोरोना काल में सेवा करने वाले किसी व्यक्ति या संस्था से ही कह दें तो चुटकियों में मदद मिल जाए, लेकिन कोई कुछ करना चाहे तब न। सरकार अगर है तो जनता को दिखनी चाहिए, क्योंकि सिर्फ आदेश और बयान से काम नहीं चलेगा। धरातल पर आकर देखना होगा कि उनके नुमाइंदे किस तरह “गुड गवर्नेंस’ की हत्या कर रहे हैं। जिम्मेदार अफसरों पर भी कार्रवाई करनी होगी।